शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

आज की ताजा खबर





आज की ताजा खबर


डिजाइन .....मनीष दुबे
ड्रांइग.........विनय अम्बर
कविता.......ब्रतोल्ड ब्रेख्त
कम्पोजिंग.....अमित विश्वकर्मा
इत्यादि ग्रुप आँफ आर्टिस्ट
man_manishd@yahoo.co.in

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

ठिठुरता माँगे एक मुठ्ठी धूप



फिर बम फटे,
निकली राजनैतिक फायदो की आग,
प्रत्यारोपो का धुँआ,
फिर खूब बिकें अखबार,
नपुंसक शांती के चीथडे,
फिर हुआ साफ,
मीडिया की कमाई का रास्ता,
टीम इंग्लैण्ड लौटी अपने घर,
मिला विराम खेलो को,
नए तरीके से खेले जाएगे,
मिला विषय चाय के ठेलो को,
उपजी पुनः चिंता की रेखाएँ नेताओ की तोंदो पर,
फिर गिरी गाज,
वादो का ईसबगोल तलाशती चमचो की फोजो पर,
इसी दौरान बढा लिया लोकतंत्र ने अपना ईमान,
शांतीपूर्ण संपन्न हुआ मतदान,
निकल आए चमनप्राश के डिब्बे,
मूक लोग कंबलो में दुबके,
गजब ठंड है,अबके।।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

विवेचना रंगमण्डलःराष्ट्रीय नाट्य समारोह

विवेचना रंगमण्डलःराष्ट्रीय नाट्य समारोह

परफार्मिंग आर्ट पर छायाचित्र प्रतियोगिता

विवेचना रंगमण्डल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह कर अन्तर्गत रंगमण्डल एंव मिलन फोटोग्राफिक सोसाइटी(मिफोसो) संयुक्त रुप से एक छायाचित्र प्रदर्शनी एंव प्रतियोगिता का आयोजन कर रही है। प्रतियोगिता का विषय है॑ परफार्मिंग आर्ट इसके अन्तर्गत छायाकार नाटक,नृत्य,समूह नृत्य,नुक्कड नाटक आदि अन्य कला विषयो पर आधारित कलात्मक छायाचित्र कम से कम 8 गुणा 12 आकार व अधिकतम 12 गुणा 15 आकार में 25 दिसम्बर तक जमा कर सकते है। रुप फोटो ग्राफर्स,चौथा पुल,सौरभ स्टूडियो,भातखंडे स्कूल के पास एंव आकार स्टूडियो,बस स्टेंड में जमा करा सकते है।
विवेचना के राष्ट्रिय नाट्य समारोह में मंचित होने जा रहें नाटको की सूची इस प्रकार हैः

दिनाँक नाटक प्रस्तुति लेखक निर्देशक
3/1/9 - हयवदन - होम सांईस कालेज,जबलपुर - गिरीश कर्नाड - आशीष पाठक.
(7.30pm)
(8.30pm) - मधुशाला - गुडी,रायगढ - हरिवंशराय बच्चन - योगेन्द्र चौबे.

4/1/9 - एनांयस - बाम्बे थियेटर कम्पनी,मुंबई- सैम बाँबरिक -शेख समी उस्मान.
(7.30pm)



5/1/9 -पाँपकार्न -समागम रगंमंडल,जबलपुर -आशीष पाठक - आशीष पाठक.
(7.30pm)
(8.30pm) -भागीरथ के बेटे -विनोद रस्तोगी स्मृति,इलाहाबाद -विनोद रस्तोगी -................... .



6/1/9 -नमक मिर्च -AK various,मुंबई -शौकत थानवी -सुमित व्यास,
(7.30pm) शिवानी टकसाले.


7/1/9 - गोदान -मंच,मुबंई -प्रेमचंद -विजय कुमार.
(7.30pm)

(8.30pm) - अब हम बिहार से चुनाव लडेंगें -मंच,मुबंई -हरिशंकर परसाई -विजय कुमार.


8/1/9 -फादर -दोस्त,भोपाल -आँगस्ट स्ट्राईनबर्ग - आलोक चटर्जी.
इस वर्ष के विवेचना रंग सम्मान से विख्यात अभिनेता/निर्देशक श्री आलोक चटर्जी को सम्मानित किया जावेगा।
नाट्य समारोह के आमत्रंण/भागीदारी/ प्रतियोगिता/नाटको सम्बधित जानकारियो हेतु सम्पर्क करेः
१. श्री अरुण पाण्डे 09893702736
२.श्री आशुतोष द्विवेदी 09425324635
३.श्री नवीन चौबे 09425386810
४.आशीष पाठक 09301111263

मंगलवार, 12 अगस्त 2008

जिंदगी ड्रांइग रुम में...





जिंदगी ड्रांइग रुम में...



बन जाओ एक फोटो फ्रेम,
लग जाओ किसी ड्रांइग रुम में,
बदलते चेहरे,
बदलते दृश्य,
समेटो किसी को अपनें अंदर,
निकाल फेंको अगले ही पल,
दूसरा फिर कोई फ्रेम में,
जिंदगी ड्राइंग रुम में,
चलती किसी फ्रेम में।।

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

हे प्रभु।। हे नायिका।।



हे प्रभु।। हे नायिका।।


ह्रदय गीत की आहट सुन,
हे चंचल सुन हो रवि किरण तुम,
जाग्रत प्रातः का जाग्रत मन,
तुम तुम और केवल तुम।।
मूक शब्दावली नहीं मनः धुन,
सितार झनक नही झंकार तुम,
निराकार संगीत का आकृत तन,
तुम तुम और केवल तुम।।
चहक महक सब मोती संग बुन,
गायक मै और श्रोता तुम,
कभी नीर क्षीर कभी चंदन वन,
तुम,तुम और केवल तुम।।
पर्वत मिलन को आतुर घन,
ह्रदयगीत का माधुर्य तुम,
गेय पद और गायक जन,
तुम,तुम और केवल तुम।।
शांत,दक्ष,योग्य और सारे गुण,
मै विश्लेषक विशेष हो तुम,
कोसो दूर कभी निकटता का फन,
तुम,तुम और केवल तुम।।


प्रभु,नायिका दोनो ही अब तक अप्राप्त।। प्राप्ति पर सिर्फ संतुष्टि देते,जो मेरे काम आती।।नहीं मिले तो कविता,सबके काम की,आलोचक बघिया उधेडेंगें,ब्लागर टिपण्णी करेंगे.........................................

रविवार, 20 जुलाई 2008

डिनर पालिटिक्स



डिनर पालीटिक्स
सभी सादर आमत्रित है,
जो सांसद है,
जिनके मुहँ घोडे से है।
सभी दल आ जाए,
रात्री भोज में,
भले संख्या में थोडे से है।
प्रार्थना करके आए,
हे! प्रभु हर बार रखना लाज,
कैसे भी हो हालात,
सांसद जरूर बनाना प्रभु,
कोई सकंट ना आए,
किंतु! सरकार पर अवश्य आ जाए,
उसी समय देना मुहँ घोडे सा,
और देना आमंत्रण डिनर का प्रभु।
लोकतन्त्र का हाथी चलाना है,
सबको डिनर पर आना है।
जो सांसद बीमार है,वर्षो से
उन पर जादू हो जाएगा,
चमत्कारी ढंग से खडे हो जाएगें,
एअर एम्बूलेन्स आएगी,
गोद में बिठा कर ले जाएगी।
ईतावली सूप मँगवाया है,
पहले भूख बढा लेना,
फिर "प्राइस टेग" लगा लेना।
तुम पर जब रथ बाँधा गया था,
अर्जुन ,गाण्डीव लिए हाँफ रहा था,
कृष्ण तुमको हाँक रहा था।
तुम्हारी स्मृतियो में भरी है,
बात याद करो,
सब रिश्ते झूठे, आगे बढो।
अरे नादान!
घूरे के भी दिन फिरते है,
पहले रथ में बँधते थे,
अब करोडो में बिकते है।
रिश्तो,नातो,विचारो से पीठ करो,
लोकतंत्र का हाथी लोगो पर ही "शिट" करे,
अमेरिका अपना पपलू "फिट" करें,
तुम ना घबराना पार्थ वाहक!
डेमोक्रेटिक मोनार्की में ,
कम्यूनिस्ट केपिटल्सम मिला लेना,
जाते ही, चार पेग काकटेल चढा लेना।
फिर देखना हाथी चलता नजर आएगा,
घोडे खुशी से झूम उठेंगें,
लोकतंत्र बच गया,
डिनर हो गया,
हाथी चल गया,
हाथी चल गया।

शनिवार, 5 जुलाई 2008

समागम रंगमण्डल,जबलपुर का आयोजन




समागम रंगमण्डल,जबलपुर का आयोजन
स्व.कश्यप झा स्मृति नाट्योत्सव
दिनाँक २५ जून को होमसांइस कालेज प्रेक्षागृह में यह आयोजन समंपन्न हुआ। कश्यप जी ने शहर ही नहीं अपितु देश के कई बडे रंगमण्डलो के साथ कार्य किया। वें कला निर्देशक थे,मंच सज्जा,रूप सज्जा मे उन्हे विशेष महारत प्राप्त थी। साथ ही लोक कलाओ की तरफ उनका रुझान था,लोक वाद्य वादन,गायन,नृत्य के साथ ही अभिनय भी किया। उपलब्धियो की लंबी फेहरिस्त के साथ साथ कश्यप आज भी सभी साथी कलाकारो के दिल में जिंदा है। मशहूर निर्देशिका नादिरा बब्बर के साथ भी कश्यप ने खूब काम किया,जो उनकी प्रशंसक भी है।यह उनकी तृतीय पुण्य तिथी थी।
समागम रंगमण्डल,प्रगतिशील साहित्य और रंगकर्म हेतु प्रतिबद्ध है,जिसके आयोजन लोकाश्रय पर होते है। इस दिन समागम ने दो नाटको का मंचन कर कश्यप को श्रद्धांजली दी।साथ ही श्री राजेश दुबे जी की कार्टून प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। जिसका शीर्षक था रंग परसाई ,यह एक अभिनव प्रयोग था,परसाई जी की व्यंग वारिधियो,सूत्र वाक्यो पर राजेश जी ने कार्टून बना कर अदभुत नजारा प्रस्तुत किया,जिसे खूब सराहा गया। फलस्वरुप एक प्रथक ब्लाग www.rangparsai.blogspot.cm भी बना दिया गया है।
"पापकार्न"एंव "सोमनाथ नाटको का मंचन भी हुआ।पापकार्न एक कहानी मंचन है।यह कथा है,रुपक की जो गाँव ने सेना में भर्ती होने शहर आता है और परस्तिथीवश पापकार्न बेचने लगता है,चलती ट्रेन मे विविध सज्जनो से भेट करता है,जिससे हास्य व्यंग पैदा होता है।टुकिया स्टेशन पर रहने वाली पागल जो सबको टकटकी लगाए देखती है,उसकी सबसे अच्छी साथी है।रुपक का जीवन जीवटता का प्रतीक बनता है,एक आम भारतीय से जुडे प्रश्नो को हँसी हंसी में बहुत गंभिरता से उढाता है,टुकिया के साथ एक हादसा उसे हिला देता है।पापकार्न बताता है,मानवजीवन टाईम पास नही है। अर्थव्यवस्था के शोर में नैतिकता हाशिये पर आ रही है।पापकार्न का मूल संदेश है। परिकल्पना,पटकथा,निर्देशन आशीष पाठक,रुपक का अभिनय विनय शर्मा,मंच परिकल्पना विनय अम्बर,संगीत सुमित,प्रकाश दुबे जी का था।
"सोमनाथ" आचार्य चतुरसेन के उपन्यास पर आधारित है। एतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित यह कथा उस वक्त की है,जब मेहमूद गजनवी सोलह बार हिंदुस्तान को अपनी तलवार और आग के हवाले कर चुका था और अब सत्रहवीं बार उसकी तुर्की बर्बर सेना कि नजर है,भव्य सोमनाथ मंदिर पर। मंदिर के अधिकारी की बाल विधवा बेटी शोभना,और एक विद्वान शूद्र देवकृष्ण की प्रेम कथा,उस समय मोड पर आ जाती है जब देवा मंदिर से शूद्र होने की वजह से निकाल दिया जाता है। अपमानित देवा अपने आत्मसम्मान की खोज मे गजनवी से मिलकर फतेह मोहम्मद हो जाता है। एक गुप्त राह से हमला कर वह सोमनाथ का गर्व भंग करता है,किंतु शोभना मौका पाकर उसका सिर कलम कर देती है़,और पहली बार अपना वैधव्य स्वीकार कर कहती है,कि वो एक शूद्र से प्रेम कर सकती है,एक म्लेछ से प्रेम कर सकति है,किंतु एक राष्ट्रद्रोही से नही।नाटक की पटकथा,निर्देशन आशीष पाठक ने किया।
दोनो ही नाटको का दर्शको ने भरपूर आनंद लिया,एक कलाकार को हम कलाकारो ने इस तरह याद किया।

शनिवार, 14 जून 2008

इकतीसवी कविता








इकतीसवी कविता
हाँ,अब मेरे पास कोई सवाल नहीं है।
मेरे सारे सवालो के जवाब,
मुझे मिल चुके है।
अब जिंदगी सुलझ चुकी है,
सरल हो चुकी है।
मै अपनी तलाश बंद कर चुका हूँ।
जीवन के प्रति प्रश्नो की धार..
बहूत ऊँचाई से गिरकर,
समाधान का जलप्रपात बन चुकी है।
वरना लंबी हो चली थी प्रश्नावली,
जैसे धडकनो/साँसो की यात्रा,
या फिर शब्दो के आभाव से,
खिंचती चली जा रही कविता की तरह,
किंतु अब पूर्ण विराम है,
केवल पूर्ण विराम।
मिट चुके है, प्रश्नचिन्ह,
धूमिल,बिलकुल खत्म से,
कि जिदंगी क्या है?
समाधान/जवाब/जिदंगी..
है,मेरी कविता की डायरी।
मुझे याद हैकि मैने,
उस दिन से जीना शुरु किया था,
जब अकेलेपन से भडभडाकर,
पहली कविता को लिखा था।
अकेलापन दूसरी,तीसरी..
और पाँचवी कविता के साथ खत्म हुआ।
खामोशी को ,
आलोचनाओ/प्रंशसाओ ने घेर लिया।
फिर मै स्वयं से ही कहने लगा अपने अहसास,
छटवी मे कष्ट, तो आठवीं में खुशी का इजहार।
नौवी कविता से वो मेरे जीवन में आई,
दसवी तक मेरे सम्पूर्ण मे समाई,लेकिन
ग्यारहवी से लगा जैसे कि लौट जाऊ?
पर जिंदगी से कोई कैसे लौटे?
वो मेरी थी,
लगता था वो मेरी थी।
तेरह,पन्द्रह से लेकर अतिंम पृष्ठ तक।
चलता रहा ये सब बीस तक,
जोडता रहा मै सपने उन्तीस तक।
लगता है,अब ये गर्माहट खत्म हो जायेगी,
अहसासो पर बर्फ जम जायेगी।
तीस में,वो मुझे छोडकर चली जायेगी।
उसके बाद...
ढेर से खाली पृष्ठ...
अब मै फिर से उलझ चुका हूँ,
सवालो को पुनः फैला चुका हूँ,
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
मै इकतीसवी कविता लिख रहा हूँ।

रविवार, 25 मई 2008

"सबसे उदास कविता"





"सबसे उदास कविता"
एक दिन हम दोनो बैठे बोर हो रहे थे,
मैने उससे कहा- "चलो खेले एक खेल"
उसने कहा "ठीक है,कैसा खेल?"
मैने कहा बस हम बैठेंगे दूर दूर,
मै बैठूँगा इधर,
तुम बैठना उधर,
एक चाँक होगी मेरे पास,
एक चाँक होगी तुम्हारे पास,
अपने सामने हम बिछाएंगे,
हम बिछएंगे अपने रिश्तो की रेखाएँ,
चाक से अपने रिश्तो की रेखाएँ आगे बाढाएंगें,
आगे बढा कर इन्हे कुछ क्रिएटिव बनाएंगे,
पहले आएगी मेरी बारी,
फिर आएगी तुम्हारी बारी,
उसने कहा ठीक है।
मैने चाक से एक रिश्ते की रेखा को लम्बा खींचा,
उसने सामने फैले रिश्तो को गौर देखा,
और कहा -"पास"!
मैने चाक से दूसरे रिश्ते की रेखा आगे बढाई,
जो जाकर पहले रिश्ते की रेखा से टकराई,
वो पलटी मुझे देखकर मुस्कुराई,
और कहा "पास"!
मैने देखा रेखाए बढ रही है,अपने आप,
उलझ रही है,अपने आप,
बन रहा है एक जाल,
रिश्तो का एक जाल,
उसने फिर कहा "पास"!
मै धँसता जा रहा था उस जाल में,
उसने फिर कहा "पास"!
मै सम्पूर्ण धँस चुका था जाल में,
उसने फिर कहा "पास"!
मैने धँसते हुए मौन तौडा,
कहा"मुझे बचाओ",
उसने देखा गौर से,
मुझे,
फैलते जाल को,
कुछ और सोचकर उसने कहा "पास"!
वो उढ कर चली गई,
मै जाल मे फँसा उसे जाते हुए देखता रहा,
उसके हाथ में अभी भी फँसी थी एक चाक,
बिना घुली एक पूरी चाक,
खेल खत्म हुआ इस तरह,
वो भी हारी इस तरह,
मै भी हारा इस तरह,
खेल खत्म हूआ इस तरह,
कुछ क्रिएटिव भी बन गया इस तरह,
खेल खत्म हुआ इस तरह।

शनिवार, 17 मई 2008

मायाः भूख से संतुलन




मायाः भूख से संतुलन
तस्वीर जबलपुर के एक चौराहे का है। वैसे किसी भी गाँव ,कस्बे का हो सकता है। वो लडकी जो रस्सी पर चलती है,उसका नाम माया है। उसके पिता हाकम पास मे ही ढोल बजा रहे है,भाई तीरक फुँदने वाली टोपी पहने माया की मदद कर रहा है।
मै काम पर जाते समय उस चौराहे से गुजर रहा था। हाकम को अपना सरकस लगाते देखा,कुछ अपनापन लगा ,आखिर मै भी तो एसा ही कुछ करने निकला था। रुक गया। देखने लगा, उसकी और अपनी प्रक्रिया का अंतर।हाकम ने सबसे पहले चार बाँस के डंडे,दो दो के युग्म में एहतियात से आमने सामने लगा दिए,फिर रस्सी बाँध दी़।अपने ढोल की तरफ बढने से पहले उसने मजबूती परखी,आखिर बेटी का मामला है।जब तक तीरक भी चेहरे पर बंदर का मेकअप कर चुका था,उसने माया को एक लोहे का रिंग दिया,जिसे माया ने गले से एक कंधे पर फँसा लिया। ढोल बजने लगा....भीड जुटने लगी.......शुरु हुआ......माया का खेल.......भूख से संतुलन का खेल....। माया को हाकम ने गोद मे लेकर रस्सी पर खडा कर दिया,और फिर से ढोल बजाने लगा,तीरक ने जोर जोर से सिर हिलाना शुरु किया तो उसकी टोपी पर लगा फुँदना भी घुमने लगा। माया भी रस्सी पर चलने लगी.एक एक कदम संभल कर,लोगो ने ताली बजायी,तीरक को देखकर हँसने लगे। तीरक ने सिर घुमाते घुमाते माया को एक लोटा दिया,माया ने सिर पर रखा,तीरक ने दो लोटे और दिए,माया ने एक एक कर सिर पर जमा लिए।हाकम ने उढकर एक १० फिट लंबा बाँस माया को थमा दिया,माया ने उसे अपने छाति पर लटक रहे लोहे के रिंग में फँसाते हुए,दोनो हाथो से थाम लिया....लोग आश्चर्य से देख रहे थे और माया रस्सी पर संतुलन बनाते हुए चल रही थी..पुनः कलाकार को तालियाँ मिली...अब हाकम ने साईकिल का रिम रस्सी पर रखा,माया ने अपने तलवे से उस पर तुरंत कब्जा कर लिया। हाकम वापस ढोल बजाने लगा। दर्शको का कौतुक चरम पर था क्यौकि अब संतुलन कठिन हो चला था..सिर पर पहले ही लोटे एक के उपर एक करीने से जमे थे और हा्थ मे डंडा। ढोल बज रहा था...तीरक सिर घुमा रहा था...फुँदना घूम रहा था...माया ने रिम को तलवे में फँसा रस्सी पर चलना शुरु किया...तालियो की आवाजे आने लगी......माया ने भूख पर संतुलन पा लिया था,अब वो रस्सी पर चलने के बजाए नाच रही थी।दर्शक ताली बजा रहे थे।तीरक ने टोपी उतारकर उसमे पैसे जमा कर लिए।खेल खतम...पैसा हजम।
सब कुछ सामान्य था।माया ने भूख पर संतुलन पा लिया था,अतः हाकम बगल की होटल मे चाय पीने चल दिया और तीरक घर से लाया डब्बा खोल, दाल चावल खाने लगा।खेल का कारण हल हो रहा था।
"माया भूख है,
भूख आग है,
आग जलाती है,
आग सिर्फ जलाती है,
माया राख हो जाती है।"
पर भौतिकता के इस समय में भूख पर संतुलन नहीं रहा। कपडे,पैट्रोल,फोन बेचने पर भी भूख पर संतुलन नही आता तो लोग फ्रेश सब्जिया तक बेचने लगते है। इनकी माया राख नही होती.....भूख शांत नही होती....इनका संतुलन तो जमीन पर भी नहीं बन रहा....रस्सी पर क्या बनेंगा। माया तुमने वो संतुलित किया........... जिससे ब्रम्हाण हार रहा है, लाख कोशिश करने पर भी बढती जाती है. .........तुमने उसे संतुलित किया.........तुमने भूख को संतुलित किया.............तुम्हे प्रणाम! कोटि कोटि प्रणाम!
आशीष पाठक
जबलपुर।


शुक्रवार, 9 मई 2008

ट्रेन के बच्चे :





ट्रेन के बच्चे :



"देख कर गरीबी वो मांग नही करते ! वरना,
बडी शौकीन होती है, बचपन की उमर"



विश्व के सर्व कालिक महानतम मनौवेज्ञानिक फ्राँयड ने बाल्यकाल की घटनाओ, वातावरण को व्यक्तित्व निर्माण में 70% उत्तरदायी माना है।बच्चे देश का भविष्य होते है।भारतीय रेल के जाल में हजारों बच्चों का बचपन बीतता है। ये बच्चे अक्सर दो तीन या अधिक के समूह में बोगी दर बोगी घूमते है, ये बच्चे भीख माँगते है, सफाई कर, पैसे माँगते है, चोरी करते है, पान मसाला बीडी सिगरेट बेचते है, पाँलीथीन, खाली बोतल बटोरते है, छोटे वाद्य बजाकर नाचते गाते है, कुछ फुटकर सामग्री बेचते है। इनमे नशे की लत प्रायः सभी में पाई जाती है,फिर वे चाहे लडकियाँ क्यों न हो। नशे भी कुछ अलग और सस्ते, हर संभव प्रकार की चबाने वाली तम्बाकू,पंक्चर जोडने की ट्यूब को कपडे में लगा कर सूँघना,चूसना,चाटना और बेदम हो पडे रहना,बीडी,कोडीनयुक्त कफ सीरप,डायजीपाम की गोलीयाँ। कुछ परिवार के साथ,कुछ अपने उस्तादों के साथ होते है,लेकिन आगे पीछे चलतें है।टिकिट की आवश्यकता इन्हे नहीं होती क्योकी ये एक छोटे से अर्थशास्त्र से जुडे होते है। अर्थशास्त्र जितना भी छोटा हो निरन्तर होने पर महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी योजनाओ,एन.जी.ओ. के माध्यम से इनसे जुडा अर्थशास्त्र बडा भी हो जाता है।नेता और अफसर इस बात को सबसे बेहतर समझते है,तभी तो उनकी पत्नियो और रिश्तेदारो के नाम पर ५, ६ एन.जी.ओ. रजिस्टर होते है। एन.जी.ओ. ने समाज सेवको को आर्थिक तरक्की दी है,सिर्फ जुगाडु समाज सेवको को! बहरहाल यक्ष प्रश्न है,किः
१.क्या कुछ किया जाना जरुरी है?
२.क्या किया जा सकता है?
३.कैसे किया जा सकता है?
४.देश का उज्जवल भविष्य बच्चे है या सिर्फ रईसो के बच्चे?
५.क्या चलती ट्रेन में बाल श्रम कानून लागू होता है?
६.एन.जी.ओ. कितनी समाज सेवा करते है और कितनी स्वंय सेवा?
७.क्या इसमे गैग संचालित बच्चे भी होते है?
८.यह लेख कैसा लगा ?


आशीष पाठक,
जबलपुर।

रविवार, 27 अप्रैल 2008

सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म





सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म
दस साल पहले चित्रकारो,कवियो,लेखको,पत्रकारो,रंगकर्मियो एंव कैमराकारो के उपजे समुह "इत्यादि ग्रुप आफ आर्टटिस्ट"ने अपनी रचना प्रक्रिया शुरु की थी,उसी तारतम्य में अपने सांस्कृतिक,रचनात्मक अवदान के लिए इस बार लघु फिल्म निर्माण की प्रक्रिया शुरु की,मन्टो की कहानी पर फिल्म बना कर। सआदत हसन मन्टो एक विवादास्पद,विश्व लेखक थें। वैसे रचनाकार सदैव जीता है,और मन्टो गूँजता रहता हैं। मन्टो अब विवादास्पद भी नही रहे,जैसा कि प्रत्येक गैरपांरपरिक लेखक और भविष्यदृष्टाओ के साथ होता हैं।ये भी हो सकता हैं कि,मन्टो की जिन बातो पर विवाद होता था वो अब इतनी सामान्य हो चली है, कि विवाद प्रेमियो का स्कोप खत्म हो गया ,और मन्टो ज्यादा तेज गूँजता है,देश, काल से ऊपर। मन्टो की एक एसी ही लघु कथा है,सौ कैंडल पावर का बल्ब। कहानी उपरी तौर पर घटना प्रधान है।किसी रात, किसी शहर में एक नौजवान मुसाफिर की मुलाकात वेश्या के दलाल से होती है। दलाल नौजवान को प्रलोभन दे,वेश्या के पास ले जाता है। वेश्या कई रातो से सोई नही है,लेकिन उसका ठिकाना,दलाल का दिया हुआ है। अतः मन मारकर,वो ऊनींदी सी मजबूर हो नौजवान के साथ चल देती है। नौजवान भला आदमी है,वेश्या के निवेदन और उसकी नींद की आवश्यकता को देखते हुए,उसे वापस छोड आता है। दो दिन बाद,नौजवान वेश्या के ठिकाने पर पहुँचता है। दरवाजा खटखटाने पर भी नहीं खुलता ,खिडकी से झाँकने पर सौ केंडल पावर के बल्ब की रौशनी में वह देखता है,जमीन पर दलाल रक्तरंजित पडा है,सिर पर चोट ,बगल में एक ईंट और पास में ही वेश्या गहरी नींद में आराम से सो रही है। कहानी छोटी सी है,किंतु खासियत उसका डेवलपमेंन्ट हैं। इसलिए फिल्म जैसे मिडीया के लिए उपयुक्त है। जबलपुर में बनी इस फिल्म का नाम है"नींद"। फिल्म की अवधि १७ मिनिट है।फिल्म की शुरुआत मन्टो के वक्तव्य से होती है। फिल्म की कास्टिंग बहुत अच्छी है। दलाल के पात्र में राजकुमार जयसवाल,नौजवान विवेक पाण्डे,वेश्या का अभिनय सुप्रिया एस.जे.अम्बर,अन्य भूमिकाओ में मनीष दास,रविन्द्र हैं।फिल्म एच.डी.व्ही.कैमरे से बनीं है,जो फिल्म देखकर समझ नहीं आता। कैमरामैन अरुण शर्मा,शैलेन्द्र त्रिवेदी है।शैलेन्द्र नगर के ही है,वर्तमान में मुम्बई में फिल्म छायाकंन कर रहें है। फिल्म के महत्वपूर्ण पक्षो से जुडे, प्रसिध्द चित्रकार विनय अम्बर ने बताया कि ,फिल्म कम संसाधनो में बनी हैं। संसाधनो की कमी फिल्म में दिखाई नहीं पडती। फिल्म का निर्देशन नगर के ही मनीष दुबे ने किया है,जो वर्तमान में,मुम्बई में कला निर्देशक के तौर पर काम कर रहे है।मनीष दुबे,सुप्रिया मूलतः चित्रकार है। फिल्म में संगीत श्रीधर नागराज ने दिया है,जो प्रतिभावान,युवा और नगर के ही है। बहुत कम समय मे बनी इस फिल्म में विनय अम्बर,अरुण पाण्डे एंव विवेचना रंगमण्डल के सदस्यो नें प्रोडक्शन में बहुत मदद की,पारिवारिक/रचनात्मक माहौल,तालमेल के सा्थ व्यवसायिक अप्रोच ने शहर में फिल्म निर्माण की संभावनाओ को भी बढा दिया है। कल फिल्म देखते समय ज्ञानरंजनजी की बात याद आई कि बाजारवाद से कहानी को बचाना चाहिए। बाजार "नींद" को कैसे लेगा वक्त बताएगा,किंतु अच्छी कहानी लेकर कुछ प्रतिभाशाली युवा बाजार में कूदने तैयार है,वो भी शहर से ही,ये महत्वपूर्ण है। क्योकि लडाई बजारवाद से है,बाजार से नहीं,जो बाजार के संवेशनशील,प्रगतीशील और सरोकारीय पहलू को साथ लेकर ही लडी जाए तो बेहतर है। मनीष दुबे,विनय अम्बर को विशेष बधाई ! जो इस बात को बेहतर समझ रहें है और सबसे जरुरी,यह काम कर रहें हैं।
सम्पर्क सूत्र :मनीष दुबे 09821685470,man_manishd@yahoo.co.in,विनय अम्बर:09826550584,सुप्रिया :09425544328






बुधवार, 23 अप्रैल 2008

बेटियाँ


बेटियाँ
तुम सोचते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी सोच को पछाडती
निकल जाएगी बहुत आगे/सितारो से परे!
तुम देखते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी आँखों को लताडती
नाप ले जाएगी/क्षितिज की भी दूरियाँ
तुम समझते रह जाओगे,
और वह तुम्हारे दिमाग की सीढियाँ लाघँती
चढ जाएगी बहुत ऊँचे/शिखर शिरोमणि पर।
तुम परखते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी विद्वत्ता को ठेंगा दिखाती बन जाएगी बडी विदुषी/
इस दुनियादारी में।
तुम जाँचते रह जाओगे
और वह तुम्हारी तमाम परीक्षाओ को मुँह चिढाती
सिध्द कर देंगी/ अपनी सर्वश्रेष्ठता।
तुम संभालते रह जाओगे
और वह तुम्हारी सारी जिम्मेदारियों के साथ साथ
उठा लेगी दायित्व सारे/पराये घर के भी।
बेटियाँ
यदि ताड़ की तरह बढती है
तो/छतनार की तरह फैलती भी हैं।
मंजू अरुण
(सम्बोधन,कांकरोली)

रविवार, 13 अप्रैल 2008

"चंडालन"



"चंडालन"
मैने देखा है,विरान और शांत,उजाड किंतु अंधेरा,
एसे डरावने शमशान में चंडालन का बसेरा,
हर बार उसे देखकर मेरी नजर घृणा से झुक जाती,
जब जब वह अधजले मुर्दे का माँस काटकर खा जाती,
पराकाष्ठा हो चली वीभत्सता की उस घडी ,
जब चंडालन मानव कपाल पर टूट पडी,
बर्तन बना था कपाल और चूल्हे ने आग पकडी,
सर्वनिकृष्ठ ईंधन था चूल्हें में,चिता की लकडी,
बालों के पीछे से लाल आखें मुझे डरा रही थी,
किंतु मेरी जिग्यासा मुझको यह दिखा रही थी,
बचे खुचे लक्षण नारी के उसने पौछ डाले,
झपड कर पकडा एक कौवे को,
और उसके पर नौंच डालें,
उस समय मेरा ह्रदय घृणा से उबक रहा था,
जब माँस के लोथडे और खून कपाल मे पक रहा था,
पक चुका माँस,जब कुत्ते के चमडे से ढ़क गया,
तब मै घृणा,विस्मय और जिग्यासा से भर गया,
मेरी जिग्यासा ने मुझ पर जादू सा कर दिया,
मुझे चंडालन के समक्ष लाकर खडा कर दिया,
मुख से शब्द फूट पडे और मुझे सूझ पडा,
डरते डरते उससे एक सवाल पूछ पडा,
रे चंडालन!तूने भयावह और गंदे स्थान पर डेरा जमाया,
निकृष्ट चूल्हे पर सबसे गंदा बर्तन चढाया,
निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
फिर किस चीज से बचाने के लिए तूने इसे ढक कर रखा है?
उसके अट्ठाहास ने वातावरण को ढक दिया ,
चुप होते हि उसने फौरन उत्तर दिया,
मैने निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
किसी देशद्रोही के पैरो की धूल इस पर न पडे,
इसलिए इसे ढक कर रखा है।

शनिवार, 12 अप्रैल 2008

दो टकियाँ दी नौकरीः कार्पोरेट कल्चर



दो टकियाँ दी नौकरीः कार्पोरेट कल्चर

अंगरेजी में एक कहावत हैं "The only problem with rat race is that,even if you win it,you will remain a rat only" मतलब चूहा दौड में समस्या हैं,कि जीतने के बाद भी आप चूहें ही रहते हैं। भूमण्डलीयकरण के उत्पादो में विदेशी पूँजी निवेश और बहुराष्टीय कंपनीयों की ढेर सी नौकरीयाँ स्वागत योग्य है,किंतु कर्मचारियो का शोषण भी बढा हैं। इसके अंतर्गत कार्य का अतिरक्त बोझ,कार्य के घंटे तय न होना,लेबर लाँ के प्रतिकूल , प्राकृतिक न्याय के नियम का पालन किए बिना स्थानांतरण,सेवा समाप्ति,मानसिक प्रतारणा भी सहज प्राप्त है।
जहाँ तक समाज का प्रश्न है,अभी वह लुभावनी तनख्वाह,cost to company,package कें मोहपाश से बाहर आकर सोचने की स्थिति मे नहीं है। पुनःस्थापन हेतु placement agencies उपलब्ध है जो उसी संस्कार के संस्थान मे पुनः कर्मचारियो को झोंक कर समस्या का अस्थाई समाधान प्रदान कर देते है। ८ घंटे काम,८घंटे आराम,८ घंटे पारिवारिक,सामाजिक,रचनात्मक जीवन से न सिर्फ कर्मचारियो का मानसिक अपितु समाजिक संतुलन भी बनता है,किंतु यह बीते समय की बात हुई। इस चूहा दौड ने रचनात्मकता तो दूर कानून (law of land) का भी अतिक्रमण कर लिया है।
कुछ स्थानों पर तो स्थिति हास्यासपद हो चुकी है,जैसे एक कंपनी का आफिस ही ३स्टार होटल है,परिवार के लिए प्रथक दिवस निर्धारित है,उस दिन कंपनी की ए.सी. बस उनके परिवारो को लाकर कर्मचारियो से मिलवा देती हैं।एसा नही हैं कि,कानून में कहीं कमीं है,किंतु संगठित कंपनियों के असंगठित कर्मचारी माँग कैसे सकते है? ट्रेड यूनियन की बात,चूहा दौड में संभव नहीं । इसे पीछे रह जाना माना जाता है। यह बात आकाओं को भी पसंद नहीं। तब अफसरशाही और लालफीताशाही में डूबे कार्पोरेट जगत में यह बात अपराध तुल्य नहीं अपराध ही है।
तो बस अपनी कीमत बोलिए और बन जाईए संभ्रांत बंधुआ मजदूर।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

यक्ष प्रश्न ही क्यो?


यक्ष प्रश्न ही क्यो?

हिन्दी ब्लागिंग के बारे में रंगमंच दिवस के दिन समीर लालजी को सुना। मन किया अपना भी ब्लाग बनाऊ,बस! पंकज स्वामी जी से समय माँगा,उन्हो ने सहर्ष समय निर्धारित कर दिया।अगले दिन सौभाग्य से गिरीश बिल्लौरेजी भी मिल गए,पंकज जी ने जितना संभव था,घंटे भर में सिखा दिया।बस! हो गए ब्लाँगर,किंतु मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात थी ब्लाँग का नाम क्या हो?इसी का वर्णन कर रहा हूँ।
"पंकज जी ने मुझसे फोन पर कहा था कि ब्लाँग का एक अच्छा सा नाम सोचकर आना। मैं सोचने लगा,,,थोडी देर में ही समझ गया यह प्रश्न महत्वपूर्ण है और कठिन भी! मैंने मौहल्ले के बच्चो से लेकर हिन्दी के समस्त सार्थक शब्दो पर विचार किया,कुछ इम्परेसिव मिला ही नही।परेशान होकर सोया,नींद आ गई।स्वपन में भी प्रश्न ने पीछा नही छोडा,समस्या पहाड सी थी, तो सपने में पहले पहाड दिखाई दिए,फिर नदी,फिर तलाब!चूँकि स्वपन दिन भर के कार्य॑ कलापो की पुनरावृत्ति होते है,तो तलाब देखते ही पहचान गया,जबलपुर का देवताल था,जो दिन में मेडिकल काँलेज के रास्ते पर मैने देखा था। मेरे स्वपन दृश्य और साफ हो रहे थे,तालाब के मध्य में एक सज्ज़न दिखाई पड़े,मैने सोचा सिंघाडे निकालने वाला होगा,उपवास के आटे हेतु लेता चँलू।
सिंघाडे की माँग पर वो ज़नाब पलटे,मुझे देखा,मुस्कुराए और कहा,वत्स! मै यक्ष हूँ,देवलोक के हिसाब में घोटाले करने की वजह से मृत्युलोक में हूँ।शापित हूँ,कि जब तक मेरे प्रश्नो के ऊत्तर न मिले मुझे इसी तालाब में रहना है। इतने मे एक पुलिस वाला तालाब के पास आकर पानी पीने झुका,यक्ष ने उसे रोककर प्रश्न पूछँना शुरु कर दिया,तुम रिश्वत क्यो लेते हो?थाने में दारु क्यो पीते हो?झूठे मुकदमों मे लोगो को क्यो फसाते हो?...............पुलिसवाला बेहोश हो गिर पडा। इतने में एक वकील पानी पीने झुका,यक्ष ने कहा ठहरो! कौन हो तुम?वकील उवाच अबे,अपन वकील है,क्या?पहले अपन रद्दी चौकी पे ह़फ्ता वसूल करता था ,उधर अपना एक बीडू से पंगा हुआ,पुलिस ने जेल मे डाला,अपना माहौल सुधरा,अपन ने वकालत कर डाली,अभी अपन खुदीच् केस करते और खुदीच् लडते है। यक्ष ने उससे भी सवाल पूछना शुरु किया तुम झूठी गवाही दिलवाते हो?बेगुनाहो को सजा़ दिलवाते हो?..................वकील बेहोश! इसके बाद यक्ष ने दूर से नेताजी को आता देख,बिना मौका दिए सवालिया नज़र से देखा। चमत्कार हुआ.................... नेता इतने मे ही बेहोश!
मैने हाथ जोड़कर कहा प्रभु आप सर्वञ है!मुझे बताए क्यो? पेटरोल,गेस कनेक्शन के ठेके नेताओ और उनके रिशतेदारो को मिलते है? किसी गरीब की बेटीकी शादी सिर्फ इसलिए नही हो पाती क्योकि वो दहेज नहीं दे सकता?१५ तारीख को तनख्वाहें खत्म हो जाती है क्यों?किसी नेता को छींक आने पर भी उसका इलाज विदेश मे होता है,जबकि एक आम आदमी सरकारी अस्पताल मे पडा सडता रहता है?बसों मे धक्के क्यो?सड़को में गड्डे क्यों?डिगरियाँ बेकार क्यों?कहाँ है इस देश की गर्वमेटं,आफ द पिपुल,बाए द पिपुल,फोर द पिपुल..........................यक्ष बेहोश!
मुझें मुफ्त मे सिंघाडे भी मिलें और अपनें ब्लाँग का नाम भी "यक्ष प्रश्न"। तो शापित हो मैं अपने प्रश्नो के साथ अपके बीच रह सँकू इसी आशा के साथ....................।"




आशीष पाठक
जबलपुर।

शनिवार, 5 अप्रैल 2008

धर्मराज जयसवालःस्मरण ऍव नाट्यान्जली


धर्मराज जयसवालःस्मरण ऍव नाट्यान्जली
जबलपुर के दिवंगत,वरिष्ठतम रंगकर्मी धर्मराज जयसवाल जी को विवेचना रंगमन्डल ऍंव ऍंकता कला मन्च के संयुक्त प्रयास से आज चन्चलाबाई महा.के प्रान्गण मे ऍक नाट्यान्जली के माध्यम से याद किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम चरण मे जबलपुर के विधानपुरुष ईश्वरदास जी रोहाणी ने माल्यार्पण कर धर्मराज जयसवाल जी को श्रध्दांजली अर्पित कर कहा कि हम कलाकार के हाड मांस के शरीर को
यादही
करते अपितु उसकी कला को करते है। संस्कारधानी की हास्य त्रिवेणी॑ के.के.नायकर,दत्रातेय कुलकर्णी,रजनीकांत त्रिवेदी ने अपने संस्मरण सुनाऐ ऍव श्री जयसवाल के योगदान को रेखांकितकिया।कार्यक्रम के दूसरे चरण मे नाट्यांजली "अमंचित प्रस्तुति" नाटक प्रस्तुत हुआ।नाटक का निर्देशन श्री अरुण पाण्डे जी ने किया था।नाटक वैसे तो ऍक पात्र द्वारा कथा वाचन के रुप मे था किंतु द्रश्य बंधो मे अन्य पात्रो के प्रयोग से कथा सम्प्रेषण प्रभावी बन पडा। नाटक मे ऍक अमंचित नाटक की कथा को मुख्य पात्र ही बताता है,जिसमे ऍक अनाम चित्रकार को पैसे देकर,ऍक ख्यातिलब्ध चित्रकार उसकी क्रति से पुरुस्कार प्राप्त कर लेता है। मुख्य पात्र के रुप मे सूरज राय जी ने अपने वाचिक अभिनय से दर्शको को बांधे रखा।अन्य भूमिकाओ मे संतोष,नवीन चौबे,विनय अम्बर आदि रहे। निर्देशन कसावटपूर्ण ऍव प्रयोगधर्मी था। अंत मे यह गरिमापूर्ण आयोजन नाटक के साथ समाप्त हुआ।

आशीष पाठक
समागम रंगमंडल,जबलपुर

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2008

नाटकःजबलपुरः०५.०४.०८


नाटकःजबलपुरः०५.०४.०८


कल आप विवेचना का नाटक ,चचलाबाई कालेज परिसर मे शाम को ७ बजे से देख सकते है।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

सोमनाथःनाटकःराष्ट्रीय नाट्य सामारोहःजबलपुर




"सोमनाथ"
क्या है सोमनाथ ?
एक तुर्की बर्बर के सफल आक्रमण का प्रतीक ?
हमारी पराजय का चिन्ह ।
गजनवी का विक्रम,उसका शौर्य?
या फिर सोमपट्टन का गर्व भंग।
एक प्रेमिका का विरह और विश्वास ?
या एक अपमानित प्रेमी का दर्प ।
क्या है सोमनाथ ?
कहीं विध्वंस के देवता ने,
स्वंय के विध्वंस का षडयंत्र तो नहीं रच डाला था ?
हाँ ! किंतु,
अदभुत है,सोमनाथ।
आशीष पाठक
(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोमनाथ" से प्रेरित)

बुधवार, 2 अप्रैल 2008

यक्ष प्रश्न 1

मैं आज से अपने ब्लाग की शुरुआत कर रहा हूं। इसके लिए यह पंक्तियां प्रस्तुत हैं-

गर चाहते हो देखना मेरी उड़ान को
तो जाओ पहले ऊंचा करो आसमान को

यक्ष प्रश्न यह है कि यह शेर किसका है ?