
"चंडालन"
मैने देखा है,विरान और शांत,उजाड किंतु अंधेरा,
एसे डरावने शमशान में चंडालन का बसेरा,
हर बार उसे देखकर मेरी नजर घृणा से झुक जाती,
जब जब वह अधजले मुर्दे का माँस काटकर खा जाती,
पराकाष्ठा हो चली वीभत्सता की उस घडी ,
जब चंडालन मानव कपाल पर टूट पडी,
बर्तन बना था कपाल और चूल्हे ने आग पकडी,
सर्वनिकृष्ठ ईंधन था चूल्हें में,चिता की लकडी,
बालों के पीछे से लाल आखें मुझे डरा रही थी,
किंतु मेरी जिग्यासा मुझको यह दिखा रही थी,
बचे खुचे लक्षण नारी के उसने पौछ डाले,
झपड कर पकडा एक कौवे को,
और उसके पर नौंच डालें,
उस समय मेरा ह्रदय घृणा से उबक रहा था,
जब माँस के लोथडे और खून कपाल मे पक रहा था,
पक चुका माँस,जब कुत्ते के चमडे से ढ़क गया,
तब मै घृणा,विस्मय और जिग्यासा से भर गया,
मेरी जिग्यासा ने मुझ पर जादू सा कर दिया,
मुझे चंडालन के समक्ष लाकर खडा कर दिया,
मुख से शब्द फूट पडे और मुझे सूझ पडा,
डरते डरते उससे एक सवाल पूछ पडा,
रे चंडालन!तूने भयावह और गंदे स्थान पर डेरा जमाया,
निकृष्ट चूल्हे पर सबसे गंदा बर्तन चढाया,
निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
फिर किस चीज से बचाने के लिए तूने इसे ढक कर रखा है?
उसके अट्ठाहास ने वातावरण को ढक दिया ,
चुप होते हि उसने फौरन उत्तर दिया,
मैने निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
किसी देशद्रोही के पैरो की धूल इस पर न पडे,
इसलिए इसे ढक कर रखा है।
3 टिप्पणियां:
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है धन्यवाद
अरे वाह!!! बहुत उम्दा..जारी रहें. शहर का नाम रोशन करें. शुभकामना.
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