मंगलवार, 29 जुलाई 2008

हे प्रभु।। हे नायिका।।



हे प्रभु।। हे नायिका।।


ह्रदय गीत की आहट सुन,
हे चंचल सुन हो रवि किरण तुम,
जाग्रत प्रातः का जाग्रत मन,
तुम तुम और केवल तुम।।
मूक शब्दावली नहीं मनः धुन,
सितार झनक नही झंकार तुम,
निराकार संगीत का आकृत तन,
तुम तुम और केवल तुम।।
चहक महक सब मोती संग बुन,
गायक मै और श्रोता तुम,
कभी नीर क्षीर कभी चंदन वन,
तुम,तुम और केवल तुम।।
पर्वत मिलन को आतुर घन,
ह्रदयगीत का माधुर्य तुम,
गेय पद और गायक जन,
तुम,तुम और केवल तुम।।
शांत,दक्ष,योग्य और सारे गुण,
मै विश्लेषक विशेष हो तुम,
कोसो दूर कभी निकटता का फन,
तुम,तुम और केवल तुम।।


प्रभु,नायिका दोनो ही अब तक अप्राप्त।। प्राप्ति पर सिर्फ संतुष्टि देते,जो मेरे काम आती।।नहीं मिले तो कविता,सबके काम की,आलोचक बघिया उधेडेंगें,ब्लागर टिपण्णी करेंगे.........................................

9 टिप्‍पणियां:

बालकिशन ने कहा…

वाह वाह
बहुत ही सुंदर.
रीति काल की रचनाओं जैसे रचना.
बधाई.

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

सही लिखा।

Unknown ने कहा…

बहुत अच्छा लिखते हो ।
पर ईतने समय बाद क्यों ?

Udan Tashtari ने कहा…

बेहद खूबसूरत...बहुत उम्दा...वाह!

समय चक्र ने कहा…

bahut badhiya rachana . badhai

"ρσωєя σƒ тяυтн ιѕ ωιтнιη мє..!" ने कहा…

ye kavita ab bhi yaad hai mujhe par shayad ab iske shabd badal die hai aapne.....

Girish Billore Mukul ने कहा…

ati uttam

pallavi trivedi ने कहा…

aapki hindi bahut hi badhiya hai...achcha likha hai.

बेनामी ने कहा…

So good......