
सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म
दस साल पहले चित्रकारो,कवियो,लेखको,पत्रकारो,रंगकर्मियो एंव कैमराकारो के उपजे समुह "इत्यादि ग्रुप आफ आर्टटिस्ट"ने अपनी रचना प्रक्रिया शुरु की थी,उसी तारतम्य में अपने सांस्कृतिक,रचनात्मक अवदान के लिए इस बार लघु फिल्म निर्माण की प्रक्रिया शुरु की,मन्टो की कहानी पर फिल्म बना कर। सआदत हसन मन्टो एक विवादास्पद,विश्व लेखक थें। वैसे रचनाकार सदैव जीता है,और मन्टो गूँजता रहता हैं। मन्टो अब विवादास्पद भी नही रहे,जैसा कि प्रत्येक गैरपांरपरिक लेखक और भविष्यदृष्टाओ के साथ होता हैं।ये भी हो सकता हैं कि,मन्टो की जिन बातो पर विवाद होता था वो अब इतनी सामान्य हो चली है, कि विवाद प्रेमियो का स्कोप खत्म हो गया ,और मन्टो ज्यादा तेज गूँजता है,देश, काल से ऊपर। मन्टो की एक एसी ही लघु कथा है,सौ कैंडल पावर का बल्ब। कहानी उपरी तौर पर घटना प्रधान है।किसी रात, किसी शहर में एक नौजवान मुसाफिर की मुलाकात वेश्या के दलाल से होती है। दलाल नौजवान को प्रलोभन दे,वेश्या के पास ले जाता है। वेश्या कई रातो से सोई नही है,लेकिन उसका ठिकाना,दलाल का दिया हुआ है। अतः मन मारकर,वो ऊनींदी सी मजबूर हो नौजवान के साथ चल देती है। नौजवान भला आदमी है,वेश्या के निवेदन और उसकी नींद की आवश्यकता को देखते हुए,उसे वापस छोड आता है। दो दिन बाद,नौजवान वेश्या के ठिकाने पर पहुँचता है। दरवाजा खटखटाने पर भी नहीं खुलता ,खिडकी से झाँकने पर सौ केंडल पावर के बल्ब की रौशनी में वह देखता है,जमीन पर दलाल रक्तरंजित पडा है,सिर पर चोट ,बगल में एक ईंट और पास में ही वेश्या गहरी नींद में आराम से सो रही है। कहानी छोटी सी है,किंतु खासियत उसका डेवलपमेंन्ट हैं। इसलिए फिल्म जैसे मिडीया के लिए उपयुक्त है। जबलपुर में बनी इस फिल्म का नाम है"नींद"। फिल्म की अवधि १७ मिनिट है।फिल्म की शुरुआत मन्टो के वक्तव्य से होती है। फिल्म की कास्टिंग बहुत अच्छी है। दलाल के पात्र में राजकुमार जयसवाल,नौजवान विवेक पाण्डे,वेश्या का अभिनय सुप्रिया एस.जे.अम्बर,अन्य भूमिकाओ में मनीष दास,रविन्द्र हैं।फिल्म एच.डी.व्ही.कैमरे से बनीं है,जो फिल्म देखकर समझ नहीं आता। कैमरामैन अरुण शर्मा,शैलेन्द्र त्रिवेदी है।शैलेन्द्र नगर के ही है,वर्तमान में मुम्बई में फिल्म छायाकंन कर रहें है। फिल्म के महत्वपूर्ण पक्षो से जुडे, प्रसिध्द चित्रकार विनय अम्बर ने बताया कि ,फिल्म कम संसाधनो में बनी हैं। संसाधनो की कमी फिल्म में दिखाई नहीं पडती। फिल्म का निर्देशन नगर के ही मनीष दुबे ने किया है,जो वर्तमान में,मुम्बई में कला निर्देशक के तौर पर काम कर रहे है।मनीष दुबे,सुप्रिया मूलतः चित्रकार है। फिल्म में संगीत श्रीधर नागराज ने दिया है,जो प्रतिभावान,युवा और नगर के ही है। बहुत कम समय मे बनी इस फिल्म में विनय अम्बर,अरुण पाण्डे एंव विवेचना रंगमण्डल के सदस्यो नें प्रोडक्शन में बहुत मदद की,पारिवारिक/रचनात्मक माहौल,तालमेल के सा्थ व्यवसायिक अप्रोच ने शहर में फिल्म निर्माण की संभावनाओ को भी बढा दिया है। कल फिल्म देखते समय ज्ञानरंजनजी की बात याद आई कि बाजारवाद से कहानी को बचाना चाहिए। बाजार "नींद" को कैसे लेगा वक्त बताएगा,किंतु अच्छी कहानी लेकर कुछ प्रतिभाशाली युवा बाजार में कूदने तैयार है,वो भी शहर से ही,ये महत्वपूर्ण है। क्योकि लडाई बजारवाद से है,बाजार से नहीं,जो बाजार के संवेशनशील,प्रगतीशील और सरोकारीय पहलू को साथ लेकर ही लडी जाए तो बेहतर है। मनीष दुबे,विनय अम्बर को विशेष बधाई ! जो इस बात को बेहतर समझ रहें है और सबसे जरुरी,यह काम कर रहें हैं।
सम्पर्क सूत्र :मनीष दुबे 09821685470,man_manishd@yahoo.co.in,विनय अम्बर:09826550584,सुप्रिया :09425544328






