रविवार, 27 अप्रैल 2008

सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म





सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म
दस साल पहले चित्रकारो,कवियो,लेखको,पत्रकारो,रंगकर्मियो एंव कैमराकारो के उपजे समुह "इत्यादि ग्रुप आफ आर्टटिस्ट"ने अपनी रचना प्रक्रिया शुरु की थी,उसी तारतम्य में अपने सांस्कृतिक,रचनात्मक अवदान के लिए इस बार लघु फिल्म निर्माण की प्रक्रिया शुरु की,मन्टो की कहानी पर फिल्म बना कर। सआदत हसन मन्टो एक विवादास्पद,विश्व लेखक थें। वैसे रचनाकार सदैव जीता है,और मन्टो गूँजता रहता हैं। मन्टो अब विवादास्पद भी नही रहे,जैसा कि प्रत्येक गैरपांरपरिक लेखक और भविष्यदृष्टाओ के साथ होता हैं।ये भी हो सकता हैं कि,मन्टो की जिन बातो पर विवाद होता था वो अब इतनी सामान्य हो चली है, कि विवाद प्रेमियो का स्कोप खत्म हो गया ,और मन्टो ज्यादा तेज गूँजता है,देश, काल से ऊपर। मन्टो की एक एसी ही लघु कथा है,सौ कैंडल पावर का बल्ब। कहानी उपरी तौर पर घटना प्रधान है।किसी रात, किसी शहर में एक नौजवान मुसाफिर की मुलाकात वेश्या के दलाल से होती है। दलाल नौजवान को प्रलोभन दे,वेश्या के पास ले जाता है। वेश्या कई रातो से सोई नही है,लेकिन उसका ठिकाना,दलाल का दिया हुआ है। अतः मन मारकर,वो ऊनींदी सी मजबूर हो नौजवान के साथ चल देती है। नौजवान भला आदमी है,वेश्या के निवेदन और उसकी नींद की आवश्यकता को देखते हुए,उसे वापस छोड आता है। दो दिन बाद,नौजवान वेश्या के ठिकाने पर पहुँचता है। दरवाजा खटखटाने पर भी नहीं खुलता ,खिडकी से झाँकने पर सौ केंडल पावर के बल्ब की रौशनी में वह देखता है,जमीन पर दलाल रक्तरंजित पडा है,सिर पर चोट ,बगल में एक ईंट और पास में ही वेश्या गहरी नींद में आराम से सो रही है। कहानी छोटी सी है,किंतु खासियत उसका डेवलपमेंन्ट हैं। इसलिए फिल्म जैसे मिडीया के लिए उपयुक्त है। जबलपुर में बनी इस फिल्म का नाम है"नींद"। फिल्म की अवधि १७ मिनिट है।फिल्म की शुरुआत मन्टो के वक्तव्य से होती है। फिल्म की कास्टिंग बहुत अच्छी है। दलाल के पात्र में राजकुमार जयसवाल,नौजवान विवेक पाण्डे,वेश्या का अभिनय सुप्रिया एस.जे.अम्बर,अन्य भूमिकाओ में मनीष दास,रविन्द्र हैं।फिल्म एच.डी.व्ही.कैमरे से बनीं है,जो फिल्म देखकर समझ नहीं आता। कैमरामैन अरुण शर्मा,शैलेन्द्र त्रिवेदी है।शैलेन्द्र नगर के ही है,वर्तमान में मुम्बई में फिल्म छायाकंन कर रहें है। फिल्म के महत्वपूर्ण पक्षो से जुडे, प्रसिध्द चित्रकार विनय अम्बर ने बताया कि ,फिल्म कम संसाधनो में बनी हैं। संसाधनो की कमी फिल्म में दिखाई नहीं पडती। फिल्म का निर्देशन नगर के ही मनीष दुबे ने किया है,जो वर्तमान में,मुम्बई में कला निर्देशक के तौर पर काम कर रहे है।मनीष दुबे,सुप्रिया मूलतः चित्रकार है। फिल्म में संगीत श्रीधर नागराज ने दिया है,जो प्रतिभावान,युवा और नगर के ही है। बहुत कम समय मे बनी इस फिल्म में विनय अम्बर,अरुण पाण्डे एंव विवेचना रंगमण्डल के सदस्यो नें प्रोडक्शन में बहुत मदद की,पारिवारिक/रचनात्मक माहौल,तालमेल के सा्थ व्यवसायिक अप्रोच ने शहर में फिल्म निर्माण की संभावनाओ को भी बढा दिया है। कल फिल्म देखते समय ज्ञानरंजनजी की बात याद आई कि बाजारवाद से कहानी को बचाना चाहिए। बाजार "नींद" को कैसे लेगा वक्त बताएगा,किंतु अच्छी कहानी लेकर कुछ प्रतिभाशाली युवा बाजार में कूदने तैयार है,वो भी शहर से ही,ये महत्वपूर्ण है। क्योकि लडाई बजारवाद से है,बाजार से नहीं,जो बाजार के संवेशनशील,प्रगतीशील और सरोकारीय पहलू को साथ लेकर ही लडी जाए तो बेहतर है। मनीष दुबे,विनय अम्बर को विशेष बधाई ! जो इस बात को बेहतर समझ रहें है और सबसे जरुरी,यह काम कर रहें हैं।
सम्पर्क सूत्र :मनीष दुबे 09821685470,man_manishd@yahoo.co.in,विनय अम्बर:09826550584,सुप्रिया :09425544328






बुधवार, 23 अप्रैल 2008

बेटियाँ


बेटियाँ
तुम सोचते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी सोच को पछाडती
निकल जाएगी बहुत आगे/सितारो से परे!
तुम देखते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी आँखों को लताडती
नाप ले जाएगी/क्षितिज की भी दूरियाँ
तुम समझते रह जाओगे,
और वह तुम्हारे दिमाग की सीढियाँ लाघँती
चढ जाएगी बहुत ऊँचे/शिखर शिरोमणि पर।
तुम परखते रह जाओगे,
और वह तुम्हारी विद्वत्ता को ठेंगा दिखाती बन जाएगी बडी विदुषी/
इस दुनियादारी में।
तुम जाँचते रह जाओगे
और वह तुम्हारी तमाम परीक्षाओ को मुँह चिढाती
सिध्द कर देंगी/ अपनी सर्वश्रेष्ठता।
तुम संभालते रह जाओगे
और वह तुम्हारी सारी जिम्मेदारियों के साथ साथ
उठा लेगी दायित्व सारे/पराये घर के भी।
बेटियाँ
यदि ताड़ की तरह बढती है
तो/छतनार की तरह फैलती भी हैं।
मंजू अरुण
(सम्बोधन,कांकरोली)

रविवार, 13 अप्रैल 2008

"चंडालन"



"चंडालन"
मैने देखा है,विरान और शांत,उजाड किंतु अंधेरा,
एसे डरावने शमशान में चंडालन का बसेरा,
हर बार उसे देखकर मेरी नजर घृणा से झुक जाती,
जब जब वह अधजले मुर्दे का माँस काटकर खा जाती,
पराकाष्ठा हो चली वीभत्सता की उस घडी ,
जब चंडालन मानव कपाल पर टूट पडी,
बर्तन बना था कपाल और चूल्हे ने आग पकडी,
सर्वनिकृष्ठ ईंधन था चूल्हें में,चिता की लकडी,
बालों के पीछे से लाल आखें मुझे डरा रही थी,
किंतु मेरी जिग्यासा मुझको यह दिखा रही थी,
बचे खुचे लक्षण नारी के उसने पौछ डाले,
झपड कर पकडा एक कौवे को,
और उसके पर नौंच डालें,
उस समय मेरा ह्रदय घृणा से उबक रहा था,
जब माँस के लोथडे और खून कपाल मे पक रहा था,
पक चुका माँस,जब कुत्ते के चमडे से ढ़क गया,
तब मै घृणा,विस्मय और जिग्यासा से भर गया,
मेरी जिग्यासा ने मुझ पर जादू सा कर दिया,
मुझे चंडालन के समक्ष लाकर खडा कर दिया,
मुख से शब्द फूट पडे और मुझे सूझ पडा,
डरते डरते उससे एक सवाल पूछ पडा,
रे चंडालन!तूने भयावह और गंदे स्थान पर डेरा जमाया,
निकृष्ट चूल्हे पर सबसे गंदा बर्तन चढाया,
निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
फिर किस चीज से बचाने के लिए तूने इसे ढक कर रखा है?
उसके अट्ठाहास ने वातावरण को ढक दिया ,
चुप होते हि उसने फौरन उत्तर दिया,
मैने निकृष्ट भोजन को इसमें पका कर रखा है,
किसी देशद्रोही के पैरो की धूल इस पर न पडे,
इसलिए इसे ढक कर रखा है।

शनिवार, 12 अप्रैल 2008

दो टकियाँ दी नौकरीः कार्पोरेट कल्चर



दो टकियाँ दी नौकरीः कार्पोरेट कल्चर

अंगरेजी में एक कहावत हैं "The only problem with rat race is that,even if you win it,you will remain a rat only" मतलब चूहा दौड में समस्या हैं,कि जीतने के बाद भी आप चूहें ही रहते हैं। भूमण्डलीयकरण के उत्पादो में विदेशी पूँजी निवेश और बहुराष्टीय कंपनीयों की ढेर सी नौकरीयाँ स्वागत योग्य है,किंतु कर्मचारियो का शोषण भी बढा हैं। इसके अंतर्गत कार्य का अतिरक्त बोझ,कार्य के घंटे तय न होना,लेबर लाँ के प्रतिकूल , प्राकृतिक न्याय के नियम का पालन किए बिना स्थानांतरण,सेवा समाप्ति,मानसिक प्रतारणा भी सहज प्राप्त है।
जहाँ तक समाज का प्रश्न है,अभी वह लुभावनी तनख्वाह,cost to company,package कें मोहपाश से बाहर आकर सोचने की स्थिति मे नहीं है। पुनःस्थापन हेतु placement agencies उपलब्ध है जो उसी संस्कार के संस्थान मे पुनः कर्मचारियो को झोंक कर समस्या का अस्थाई समाधान प्रदान कर देते है। ८ घंटे काम,८घंटे आराम,८ घंटे पारिवारिक,सामाजिक,रचनात्मक जीवन से न सिर्फ कर्मचारियो का मानसिक अपितु समाजिक संतुलन भी बनता है,किंतु यह बीते समय की बात हुई। इस चूहा दौड ने रचनात्मकता तो दूर कानून (law of land) का भी अतिक्रमण कर लिया है।
कुछ स्थानों पर तो स्थिति हास्यासपद हो चुकी है,जैसे एक कंपनी का आफिस ही ३स्टार होटल है,परिवार के लिए प्रथक दिवस निर्धारित है,उस दिन कंपनी की ए.सी. बस उनके परिवारो को लाकर कर्मचारियो से मिलवा देती हैं।एसा नही हैं कि,कानून में कहीं कमीं है,किंतु संगठित कंपनियों के असंगठित कर्मचारी माँग कैसे सकते है? ट्रेड यूनियन की बात,चूहा दौड में संभव नहीं । इसे पीछे रह जाना माना जाता है। यह बात आकाओं को भी पसंद नहीं। तब अफसरशाही और लालफीताशाही में डूबे कार्पोरेट जगत में यह बात अपराध तुल्य नहीं अपराध ही है।
तो बस अपनी कीमत बोलिए और बन जाईए संभ्रांत बंधुआ मजदूर।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

यक्ष प्रश्न ही क्यो?


यक्ष प्रश्न ही क्यो?

हिन्दी ब्लागिंग के बारे में रंगमंच दिवस के दिन समीर लालजी को सुना। मन किया अपना भी ब्लाग बनाऊ,बस! पंकज स्वामी जी से समय माँगा,उन्हो ने सहर्ष समय निर्धारित कर दिया।अगले दिन सौभाग्य से गिरीश बिल्लौरेजी भी मिल गए,पंकज जी ने जितना संभव था,घंटे भर में सिखा दिया।बस! हो गए ब्लाँगर,किंतु मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात थी ब्लाँग का नाम क्या हो?इसी का वर्णन कर रहा हूँ।
"पंकज जी ने मुझसे फोन पर कहा था कि ब्लाँग का एक अच्छा सा नाम सोचकर आना। मैं सोचने लगा,,,थोडी देर में ही समझ गया यह प्रश्न महत्वपूर्ण है और कठिन भी! मैंने मौहल्ले के बच्चो से लेकर हिन्दी के समस्त सार्थक शब्दो पर विचार किया,कुछ इम्परेसिव मिला ही नही।परेशान होकर सोया,नींद आ गई।स्वपन में भी प्रश्न ने पीछा नही छोडा,समस्या पहाड सी थी, तो सपने में पहले पहाड दिखाई दिए,फिर नदी,फिर तलाब!चूँकि स्वपन दिन भर के कार्य॑ कलापो की पुनरावृत्ति होते है,तो तलाब देखते ही पहचान गया,जबलपुर का देवताल था,जो दिन में मेडिकल काँलेज के रास्ते पर मैने देखा था। मेरे स्वपन दृश्य और साफ हो रहे थे,तालाब के मध्य में एक सज्ज़न दिखाई पड़े,मैने सोचा सिंघाडे निकालने वाला होगा,उपवास के आटे हेतु लेता चँलू।
सिंघाडे की माँग पर वो ज़नाब पलटे,मुझे देखा,मुस्कुराए और कहा,वत्स! मै यक्ष हूँ,देवलोक के हिसाब में घोटाले करने की वजह से मृत्युलोक में हूँ।शापित हूँ,कि जब तक मेरे प्रश्नो के ऊत्तर न मिले मुझे इसी तालाब में रहना है। इतने मे एक पुलिस वाला तालाब के पास आकर पानी पीने झुका,यक्ष ने उसे रोककर प्रश्न पूछँना शुरु कर दिया,तुम रिश्वत क्यो लेते हो?थाने में दारु क्यो पीते हो?झूठे मुकदमों मे लोगो को क्यो फसाते हो?...............पुलिसवाला बेहोश हो गिर पडा। इतने में एक वकील पानी पीने झुका,यक्ष ने कहा ठहरो! कौन हो तुम?वकील उवाच अबे,अपन वकील है,क्या?पहले अपन रद्दी चौकी पे ह़फ्ता वसूल करता था ,उधर अपना एक बीडू से पंगा हुआ,पुलिस ने जेल मे डाला,अपना माहौल सुधरा,अपन ने वकालत कर डाली,अभी अपन खुदीच् केस करते और खुदीच् लडते है। यक्ष ने उससे भी सवाल पूछना शुरु किया तुम झूठी गवाही दिलवाते हो?बेगुनाहो को सजा़ दिलवाते हो?..................वकील बेहोश! इसके बाद यक्ष ने दूर से नेताजी को आता देख,बिना मौका दिए सवालिया नज़र से देखा। चमत्कार हुआ.................... नेता इतने मे ही बेहोश!
मैने हाथ जोड़कर कहा प्रभु आप सर्वञ है!मुझे बताए क्यो? पेटरोल,गेस कनेक्शन के ठेके नेताओ और उनके रिशतेदारो को मिलते है? किसी गरीब की बेटीकी शादी सिर्फ इसलिए नही हो पाती क्योकि वो दहेज नहीं दे सकता?१५ तारीख को तनख्वाहें खत्म हो जाती है क्यों?किसी नेता को छींक आने पर भी उसका इलाज विदेश मे होता है,जबकि एक आम आदमी सरकारी अस्पताल मे पडा सडता रहता है?बसों मे धक्के क्यो?सड़को में गड्डे क्यों?डिगरियाँ बेकार क्यों?कहाँ है इस देश की गर्वमेटं,आफ द पिपुल,बाए द पिपुल,फोर द पिपुल..........................यक्ष बेहोश!
मुझें मुफ्त मे सिंघाडे भी मिलें और अपनें ब्लाँग का नाम भी "यक्ष प्रश्न"। तो शापित हो मैं अपने प्रश्नो के साथ अपके बीच रह सँकू इसी आशा के साथ....................।"




आशीष पाठक
जबलपुर।

शनिवार, 5 अप्रैल 2008

धर्मराज जयसवालःस्मरण ऍव नाट्यान्जली


धर्मराज जयसवालःस्मरण ऍव नाट्यान्जली
जबलपुर के दिवंगत,वरिष्ठतम रंगकर्मी धर्मराज जयसवाल जी को विवेचना रंगमन्डल ऍंव ऍंकता कला मन्च के संयुक्त प्रयास से आज चन्चलाबाई महा.के प्रान्गण मे ऍक नाट्यान्जली के माध्यम से याद किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम चरण मे जबलपुर के विधानपुरुष ईश्वरदास जी रोहाणी ने माल्यार्पण कर धर्मराज जयसवाल जी को श्रध्दांजली अर्पित कर कहा कि हम कलाकार के हाड मांस के शरीर को
यादही
करते अपितु उसकी कला को करते है। संस्कारधानी की हास्य त्रिवेणी॑ के.के.नायकर,दत्रातेय कुलकर्णी,रजनीकांत त्रिवेदी ने अपने संस्मरण सुनाऐ ऍव श्री जयसवाल के योगदान को रेखांकितकिया।कार्यक्रम के दूसरे चरण मे नाट्यांजली "अमंचित प्रस्तुति" नाटक प्रस्तुत हुआ।नाटक का निर्देशन श्री अरुण पाण्डे जी ने किया था।नाटक वैसे तो ऍक पात्र द्वारा कथा वाचन के रुप मे था किंतु द्रश्य बंधो मे अन्य पात्रो के प्रयोग से कथा सम्प्रेषण प्रभावी बन पडा। नाटक मे ऍक अमंचित नाटक की कथा को मुख्य पात्र ही बताता है,जिसमे ऍक अनाम चित्रकार को पैसे देकर,ऍक ख्यातिलब्ध चित्रकार उसकी क्रति से पुरुस्कार प्राप्त कर लेता है। मुख्य पात्र के रुप मे सूरज राय जी ने अपने वाचिक अभिनय से दर्शको को बांधे रखा।अन्य भूमिकाओ मे संतोष,नवीन चौबे,विनय अम्बर आदि रहे। निर्देशन कसावटपूर्ण ऍव प्रयोगधर्मी था। अंत मे यह गरिमापूर्ण आयोजन नाटक के साथ समाप्त हुआ।

आशीष पाठक
समागम रंगमंडल,जबलपुर

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2008

नाटकःजबलपुरः०५.०४.०८


नाटकःजबलपुरः०५.०४.०८


कल आप विवेचना का नाटक ,चचलाबाई कालेज परिसर मे शाम को ७ बजे से देख सकते है।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

सोमनाथःनाटकःराष्ट्रीय नाट्य सामारोहःजबलपुर




"सोमनाथ"
क्या है सोमनाथ ?
एक तुर्की बर्बर के सफल आक्रमण का प्रतीक ?
हमारी पराजय का चिन्ह ।
गजनवी का विक्रम,उसका शौर्य?
या फिर सोमपट्टन का गर्व भंग।
एक प्रेमिका का विरह और विश्वास ?
या एक अपमानित प्रेमी का दर्प ।
क्या है सोमनाथ ?
कहीं विध्वंस के देवता ने,
स्वंय के विध्वंस का षडयंत्र तो नहीं रच डाला था ?
हाँ ! किंतु,
अदभुत है,सोमनाथ।
आशीष पाठक
(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोमनाथ" से प्रेरित)

बुधवार, 2 अप्रैल 2008

यक्ष प्रश्न 1

मैं आज से अपने ब्लाग की शुरुआत कर रहा हूं। इसके लिए यह पंक्तियां प्रस्तुत हैं-

गर चाहते हो देखना मेरी उड़ान को
तो जाओ पहले ऊंचा करो आसमान को

यक्ष प्रश्न यह है कि यह शेर किसका है ?