

"सबसे उदास कविता"
एक दिन हम दोनो बैठे बोर हो रहे थे,
मैने उससे कहा- "चलो खेले एक खेल"
उसने कहा "ठीक है,कैसा खेल?"
मैने कहा बस हम बैठेंगे दूर दूर,
मै बैठूँगा इधर,
तुम बैठना उधर,
एक चाँक होगी मेरे पास,
एक चाँक होगी तुम्हारे पास,
अपने सामने हम बिछाएंगे,
हम बिछएंगे अपने रिश्तो की रेखाएँ,
चाक से अपने रिश्तो की रेखाएँ आगे बाढाएंगें,
आगे बढा कर इन्हे कुछ क्रिएटिव बनाएंगे,
पहले आएगी मेरी बारी,
फिर आएगी तुम्हारी बारी,
उसने कहा ठीक है।
मैने चाक से एक रिश्ते की रेखा को लम्बा खींचा,
उसने सामने फैले रिश्तो को गौर देखा,
और कहा -"पास"!
मैने चाक से दूसरे रिश्ते की रेखा आगे बढाई,
जो जाकर पहले रिश्ते की रेखा से टकराई,
वो पलटी मुझे देखकर मुस्कुराई,
और कहा "पास"!
मैने देखा रेखाए बढ रही है,अपने आप,
उलझ रही है,अपने आप,
बन रहा है एक जाल,
रिश्तो का एक जाल,
उसने फिर कहा "पास"!
मै धँसता जा रहा था उस जाल में,
उसने फिर कहा "पास"!
मै सम्पूर्ण धँस चुका था जाल में,
उसने फिर कहा "पास"!
मैने धँसते हुए मौन तौडा,
कहा"मुझे बचाओ",
उसने देखा गौर से,
मुझे,
फैलते जाल को,
कुछ और सोचकर उसने कहा "पास"!
वो उढ कर चली गई,
मै जाल मे फँसा उसे जाते हुए देखता रहा,
उसके हाथ में अभी भी फँसी थी एक चाक,
बिना घुली एक पूरी चाक,
खेल खत्म हुआ इस तरह,
वो भी हारी इस तरह,
मै भी हारा इस तरह,
खेल खत्म हूआ इस तरह,
कुछ क्रिएटिव भी बन गया इस तरह,
खेल खत्म हुआ इस तरह।



