यक्ष प्रश्न ही क्यो?
हिन्दी ब्लागिंग के बारे में रंगमंच दिवस के दिन समीर लालजी को सुना। मन किया अपना भी ब्लाग बनाऊ,बस! पंकज स्वामी जी से समय माँगा,उन्हो ने सहर्ष समय निर्धारित कर दिया।अगले दिन सौभाग्य से गिरीश बिल्लौरेजी भी मिल गए,पंकज जी ने जितना संभव था,घंटे भर में सिखा दिया।बस! हो गए ब्लाँगर,किंतु मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात थी ब्लाँग का नाम क्या हो?इसी का वर्णन कर रहा हूँ।
"पंकज जी ने मुझसे फोन पर कहा था कि ब्लाँग का एक अच्छा सा नाम सोचकर आना। मैं सोचने लगा,,,थोडी देर में ही समझ गया यह प्रश्न महत्वपूर्ण है और कठिन भी! मैंने मौहल्ले के बच्चो से लेकर हिन्दी के समस्त सार्थक शब्दो पर विचार किया,कुछ इम्परेसिव मिला ही नही।परेशान होकर सोया,नींद आ गई।स्वपन में भी प्रश्न ने पीछा नही छोडा,समस्या पहाड सी थी, तो सपने में पहले पहाड दिखाई दिए,फिर नदी,फिर तलाब!चूँकि स्वपन दिन भर के कार्य॑ कलापो की पुनरावृत्ति होते है,तो तलाब देखते ही पहचान गया,जबलपुर का देवताल था,जो दिन में मेडिकल काँलेज के रास्ते पर मैने देखा था। मेरे स्वपन दृश्य और साफ हो रहे थे,तालाब के मध्य में एक सज्ज़न दिखाई पड़े,मैने सोचा सिंघाडे निकालने वाला होगा,उपवास के आटे हेतु लेता चँलू।
सिंघाडे की माँग पर वो ज़नाब पलटे,मुझे देखा,मुस्कुराए और कहा,वत्स! मै यक्ष हूँ,देवलोक के हिसाब में घोटाले करने की वजह से मृत्युलोक में हूँ।शापित हूँ,कि जब तक मेरे प्रश्नो के ऊत्तर न मिले मुझे इसी तालाब में रहना है। इतने मे एक पुलिस वाला तालाब के पास आकर पानी पीने झुका,यक्ष ने उसे रोककर प्रश्न पूछँना शुरु कर दिया,तुम रिश्वत क्यो लेते हो?थाने में दारु क्यो पीते हो?झूठे मुकदमों मे लोगो को क्यो फसाते हो?...............पुलिसवाला बेहोश हो गिर पडा। इतने में एक वकील पानी पीने झुका,यक्ष ने कहा ठहरो! कौन हो तुम?वकील उवाच अबे,अपन वकील है,क्या?पहले अपन रद्दी चौकी पे ह़फ्ता वसूल करता था ,उधर अपना एक बीडू से पंगा हुआ,पुलिस ने जेल मे डाला,अपना माहौल सुधरा,अपन ने वकालत कर डाली,अभी अपन खुदीच् केस करते और खुदीच् लडते है। यक्ष ने उससे भी सवाल पूछना शुरु किया तुम झूठी गवाही दिलवाते हो?बेगुनाहो को सजा़ दिलवाते हो?..................वकील बेहोश! इसके बाद यक्ष ने दूर से नेताजी को आता देख,बिना मौका दिए सवालिया नज़र से देखा। चमत्कार हुआ.................... नेता इतने मे ही बेहोश!
मैने हाथ जोड़कर कहा प्रभु आप सर्वञ है!मुझे बताए क्यो? पेटरोल,गेस कनेक्शन के ठेके नेताओ और उनके रिशतेदारो को मिलते है? किसी गरीब की बेटीकी शादी सिर्फ इसलिए नही हो पाती क्योकि वो दहेज नहीं दे सकता?१५ तारीख को तनख्वाहें खत्म हो जाती है क्यों?किसी नेता को छींक आने पर भी उसका इलाज विदेश मे होता है,जबकि एक आम आदमी सरकारी अस्पताल मे पडा सडता रहता है?बसों मे धक्के क्यो?सड़को में गड्डे क्यों?डिगरियाँ बेकार क्यों?कहाँ है इस देश की गर्वमेटं,आफ द पिपुल,बाए द पिपुल,फोर द पिपुल..........................यक्ष बेहोश!
मुझें मुफ्त मे सिंघाडे भी मिलें और अपनें ब्लाँग का नाम भी "यक्ष प्रश्न"। तो शापित हो मैं अपने प्रश्नो के साथ अपके बीच रह सँकू इसी आशा के साथ....................।"
आशीष पाठक
जबलपुर।
हिन्दी ब्लागिंग के बारे में रंगमंच दिवस के दिन समीर लालजी को सुना। मन किया अपना भी ब्लाग बनाऊ,बस! पंकज स्वामी जी से समय माँगा,उन्हो ने सहर्ष समय निर्धारित कर दिया।अगले दिन सौभाग्य से गिरीश बिल्लौरेजी भी मिल गए,पंकज जी ने जितना संभव था,घंटे भर में सिखा दिया।बस! हो गए ब्लाँगर,किंतु मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात थी ब्लाँग का नाम क्या हो?इसी का वर्णन कर रहा हूँ।
"पंकज जी ने मुझसे फोन पर कहा था कि ब्लाँग का एक अच्छा सा नाम सोचकर आना। मैं सोचने लगा,,,थोडी देर में ही समझ गया यह प्रश्न महत्वपूर्ण है और कठिन भी! मैंने मौहल्ले के बच्चो से लेकर हिन्दी के समस्त सार्थक शब्दो पर विचार किया,कुछ इम्परेसिव मिला ही नही।परेशान होकर सोया,नींद आ गई।स्वपन में भी प्रश्न ने पीछा नही छोडा,समस्या पहाड सी थी, तो सपने में पहले पहाड दिखाई दिए,फिर नदी,फिर तलाब!चूँकि स्वपन दिन भर के कार्य॑ कलापो की पुनरावृत्ति होते है,तो तलाब देखते ही पहचान गया,जबलपुर का देवताल था,जो दिन में मेडिकल काँलेज के रास्ते पर मैने देखा था। मेरे स्वपन दृश्य और साफ हो रहे थे,तालाब के मध्य में एक सज्ज़न दिखाई पड़े,मैने सोचा सिंघाडे निकालने वाला होगा,उपवास के आटे हेतु लेता चँलू।
सिंघाडे की माँग पर वो ज़नाब पलटे,मुझे देखा,मुस्कुराए और कहा,वत्स! मै यक्ष हूँ,देवलोक के हिसाब में घोटाले करने की वजह से मृत्युलोक में हूँ।शापित हूँ,कि जब तक मेरे प्रश्नो के ऊत्तर न मिले मुझे इसी तालाब में रहना है। इतने मे एक पुलिस वाला तालाब के पास आकर पानी पीने झुका,यक्ष ने उसे रोककर प्रश्न पूछँना शुरु कर दिया,तुम रिश्वत क्यो लेते हो?थाने में दारु क्यो पीते हो?झूठे मुकदमों मे लोगो को क्यो फसाते हो?...............पुलिसवाला बेहोश हो गिर पडा। इतने में एक वकील पानी पीने झुका,यक्ष ने कहा ठहरो! कौन हो तुम?वकील उवाच अबे,अपन वकील है,क्या?पहले अपन रद्दी चौकी पे ह़फ्ता वसूल करता था ,उधर अपना एक बीडू से पंगा हुआ,पुलिस ने जेल मे डाला,अपना माहौल सुधरा,अपन ने वकालत कर डाली,अभी अपन खुदीच् केस करते और खुदीच् लडते है। यक्ष ने उससे भी सवाल पूछना शुरु किया तुम झूठी गवाही दिलवाते हो?बेगुनाहो को सजा़ दिलवाते हो?..................वकील बेहोश! इसके बाद यक्ष ने दूर से नेताजी को आता देख,बिना मौका दिए सवालिया नज़र से देखा। चमत्कार हुआ.................... नेता इतने मे ही बेहोश!
मैने हाथ जोड़कर कहा प्रभु आप सर्वञ है!मुझे बताए क्यो? पेटरोल,गेस कनेक्शन के ठेके नेताओ और उनके रिशतेदारो को मिलते है? किसी गरीब की बेटीकी शादी सिर्फ इसलिए नही हो पाती क्योकि वो दहेज नहीं दे सकता?१५ तारीख को तनख्वाहें खत्म हो जाती है क्यों?किसी नेता को छींक आने पर भी उसका इलाज विदेश मे होता है,जबकि एक आम आदमी सरकारी अस्पताल मे पडा सडता रहता है?बसों मे धक्के क्यो?सड़को में गड्डे क्यों?डिगरियाँ बेकार क्यों?कहाँ है इस देश की गर्वमेटं,आफ द पिपुल,बाए द पिपुल,फोर द पिपुल..........................यक्ष बेहोश!
मुझें मुफ्त मे सिंघाडे भी मिलें और अपनें ब्लाँग का नाम भी "यक्ष प्रश्न"। तो शापित हो मैं अपने प्रश्नो के साथ अपके बीच रह सँकू इसी आशा के साथ....................।"
आशीष पाठक
जबलपुर।
3 टिप्पणियां:
रूह तलक है दर्द की सीढी,नाज़ुक कदमों से चढ़़ना
अक्षर-अक्षर एक आंसू है,आंसू की गंगा गढ़ना
पन्ना पन्ना , का इस किताब का हाथ जोड़ कर कहता है-
मैं चिंटठी एहसास की हूँ, एहसास न हो तो मत पढ़ना..!!
के स्थान पे होता
ये किताब एहसास की चिट्ठी चिंटठी , एहसास न हो तो मत पढ़ना..!!
मेरे दिमाग में ये यक्ष प्रश्न तहलका मचा रहा है
स्वागत है हिन्दी ब्लॉगजगत में. नियमित लिखें. अभी लम्बा सफर तय करना है हम लोगों को. काफिला बनाओ तो आनन्द आये. मेरी शुभकामना. ब्लॉगवाणी पर आ गये या नहीं वरना लिखो-sameer.lal@gmail.com
yaksh prashn.....kafi acha naam hai blog ka..par kuch prash mere bhi hai....unka jawab kaun dega....?
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