शनिवार, 5 जुलाई 2008

समागम रंगमण्डल,जबलपुर का आयोजन




समागम रंगमण्डल,जबलपुर का आयोजन
स्व.कश्यप झा स्मृति नाट्योत्सव
दिनाँक २५ जून को होमसांइस कालेज प्रेक्षागृह में यह आयोजन समंपन्न हुआ। कश्यप जी ने शहर ही नहीं अपितु देश के कई बडे रंगमण्डलो के साथ कार्य किया। वें कला निर्देशक थे,मंच सज्जा,रूप सज्जा मे उन्हे विशेष महारत प्राप्त थी। साथ ही लोक कलाओ की तरफ उनका रुझान था,लोक वाद्य वादन,गायन,नृत्य के साथ ही अभिनय भी किया। उपलब्धियो की लंबी फेहरिस्त के साथ साथ कश्यप आज भी सभी साथी कलाकारो के दिल में जिंदा है। मशहूर निर्देशिका नादिरा बब्बर के साथ भी कश्यप ने खूब काम किया,जो उनकी प्रशंसक भी है।यह उनकी तृतीय पुण्य तिथी थी।
समागम रंगमण्डल,प्रगतिशील साहित्य और रंगकर्म हेतु प्रतिबद्ध है,जिसके आयोजन लोकाश्रय पर होते है। इस दिन समागम ने दो नाटको का मंचन कर कश्यप को श्रद्धांजली दी।साथ ही श्री राजेश दुबे जी की कार्टून प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। जिसका शीर्षक था रंग परसाई ,यह एक अभिनव प्रयोग था,परसाई जी की व्यंग वारिधियो,सूत्र वाक्यो पर राजेश जी ने कार्टून बना कर अदभुत नजारा प्रस्तुत किया,जिसे खूब सराहा गया। फलस्वरुप एक प्रथक ब्लाग www.rangparsai.blogspot.cm भी बना दिया गया है।
"पापकार्न"एंव "सोमनाथ नाटको का मंचन भी हुआ।पापकार्न एक कहानी मंचन है।यह कथा है,रुपक की जो गाँव ने सेना में भर्ती होने शहर आता है और परस्तिथीवश पापकार्न बेचने लगता है,चलती ट्रेन मे विविध सज्जनो से भेट करता है,जिससे हास्य व्यंग पैदा होता है।टुकिया स्टेशन पर रहने वाली पागल जो सबको टकटकी लगाए देखती है,उसकी सबसे अच्छी साथी है।रुपक का जीवन जीवटता का प्रतीक बनता है,एक आम भारतीय से जुडे प्रश्नो को हँसी हंसी में बहुत गंभिरता से उढाता है,टुकिया के साथ एक हादसा उसे हिला देता है।पापकार्न बताता है,मानवजीवन टाईम पास नही है। अर्थव्यवस्था के शोर में नैतिकता हाशिये पर आ रही है।पापकार्न का मूल संदेश है। परिकल्पना,पटकथा,निर्देशन आशीष पाठक,रुपक का अभिनय विनय शर्मा,मंच परिकल्पना विनय अम्बर,संगीत सुमित,प्रकाश दुबे जी का था।
"सोमनाथ" आचार्य चतुरसेन के उपन्यास पर आधारित है। एतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित यह कथा उस वक्त की है,जब मेहमूद गजनवी सोलह बार हिंदुस्तान को अपनी तलवार और आग के हवाले कर चुका था और अब सत्रहवीं बार उसकी तुर्की बर्बर सेना कि नजर है,भव्य सोमनाथ मंदिर पर। मंदिर के अधिकारी की बाल विधवा बेटी शोभना,और एक विद्वान शूद्र देवकृष्ण की प्रेम कथा,उस समय मोड पर आ जाती है जब देवा मंदिर से शूद्र होने की वजह से निकाल दिया जाता है। अपमानित देवा अपने आत्मसम्मान की खोज मे गजनवी से मिलकर फतेह मोहम्मद हो जाता है। एक गुप्त राह से हमला कर वह सोमनाथ का गर्व भंग करता है,किंतु शोभना मौका पाकर उसका सिर कलम कर देती है़,और पहली बार अपना वैधव्य स्वीकार कर कहती है,कि वो एक शूद्र से प्रेम कर सकती है,एक म्लेछ से प्रेम कर सकति है,किंतु एक राष्ट्रद्रोही से नही।नाटक की पटकथा,निर्देशन आशीष पाठक ने किया।
दोनो ही नाटको का दर्शको ने भरपूर आनंद लिया,एक कलाकार को हम कलाकारो ने इस तरह याद किया।

7 टिप्‍पणियां:

समय चक्र ने कहा…

sanskaaradhani me natay sambandhi janakari dene ke liye dhanyswad.sameeksha bahut achchi hai .

Doobe ji ने कहा…

MERI SHUBHKAMNAYEN ISI TARHA AAGE BADTE CHALO

Doobe ji ने कहा…

cogratulations keep it up

Udan Tashtari ने कहा…

आभार इस बेहतरीन रिपोर्ट के लिए. समागम रंगमंडल को बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

"ρσωєя σƒ тяυтн ιѕ ωιтнιη мє..!" ने कहा…

samagam rangmandal ko hardik badhaiya...

pallavi trivedi ने कहा…

bahut badhai aur shubhkaamnayen...

PRAVIN ने कहा…

AASHISH TUMARE BARE ME SUNA BAHUT LEKIN JANA TUMARE BLOG KE JARIYE. SAMVEDNAO KA PUNJ HI SAHITYA SRAJIT KAR SAKTA HAI..... BADHAAAAI