गुरुवार, 27 नवंबर 2008

ठिठुरता माँगे एक मुठ्ठी धूप



फिर बम फटे,
निकली राजनैतिक फायदो की आग,
प्रत्यारोपो का धुँआ,
फिर खूब बिकें अखबार,
नपुंसक शांती के चीथडे,
फिर हुआ साफ,
मीडिया की कमाई का रास्ता,
टीम इंग्लैण्ड लौटी अपने घर,
मिला विराम खेलो को,
नए तरीके से खेले जाएगे,
मिला विषय चाय के ठेलो को,
उपजी पुनः चिंता की रेखाएँ नेताओ की तोंदो पर,
फिर गिरी गाज,
वादो का ईसबगोल तलाशती चमचो की फोजो पर,
इसी दौरान बढा लिया लोकतंत्र ने अपना ईमान,
शांतीपूर्ण संपन्न हुआ मतदान,
निकल आए चमनप्राश के डिब्बे,
मूक लोग कंबलो में दुबके,
गजब ठंड है,अबके।।

3 टिप्‍पणियां:

Doobe ji ने कहा…

good one BADHAI

Girish Billore Mukul ने कहा…

मूक लोग कंबलो में दुबके,
गजब ठंड है,अबके।।
वह क्या बिम्ब है

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

आशीष जी करारा व्यंग्य है आपकी रचना "ठिठुरता माँगे एक मुठ्ठी धूप" में.
-विजय