

इकतीसवी कविता
हाँ,अब मेरे पास कोई सवाल नहीं है।
मेरे सारे सवालो के जवाब,
मुझे मिल चुके है।
अब जिंदगी सुलझ चुकी है,
सरल हो चुकी है।
मै अपनी तलाश बंद कर चुका हूँ।
जीवन के प्रति प्रश्नो की धार..
बहूत ऊँचाई से गिरकर,
समाधान का जलप्रपात बन चुकी है।
वरना लंबी हो चली थी प्रश्नावली,
जैसे धडकनो/साँसो की यात्रा,
या फिर शब्दो के आभाव से,
खिंचती चली जा रही कविता की तरह,
किंतु अब पूर्ण विराम है,
केवल पूर्ण विराम।
मिट चुके है, प्रश्नचिन्ह,
धूमिल,बिलकुल खत्म से,
कि जिदंगी क्या है?
समाधान/जवाब/जिदंगी..
है,मेरी कविता की डायरी।
मुझे याद हैकि मैने,
उस दिन से जीना शुरु किया था,
जब अकेलेपन से भडभडाकर,
पहली कविता को लिखा था।
अकेलापन दूसरी,तीसरी..
और पाँचवी कविता के साथ खत्म हुआ।
खामोशी को ,
आलोचनाओ/प्रंशसाओ ने घेर लिया।
फिर मै स्वयं से ही कहने लगा अपने अहसास,
छटवी मे कष्ट, तो आठवीं में खुशी का इजहार।
नौवी कविता से वो मेरे जीवन में आई,
दसवी तक मेरे सम्पूर्ण मे समाई,लेकिन
ग्यारहवी से लगा जैसे कि लौट जाऊ?
पर जिंदगी से कोई कैसे लौटे?
वो मेरी थी,
लगता था वो मेरी थी।
तेरह,पन्द्रह से लेकर अतिंम पृष्ठ तक।
चलता रहा ये सब बीस तक,
जोडता रहा मै सपने उन्तीस तक।
लगता है,अब ये गर्माहट खत्म हो जायेगी,
अहसासो पर बर्फ जम जायेगी।
तीस में,वो मुझे छोडकर चली जायेगी।
उसके बाद...
ढेर से खाली पृष्ठ...
अब मै फिर से उलझ चुका हूँ,
सवालो को पुनः फैला चुका हूँ,
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
मै इकतीसवी कविता लिख रहा हूँ।
10 टिप्पणियां:
उसके बाद...
ढेर से खाली पृष्ठ...
अब मै फिर से उलझ चुका हूँ,
सवालो को पुनः फैला चुका हूँ,
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
मै इकतीसवी कविता लिख रहा हूँ।
असाधारण और संग्रहणीय रचना..
***राजीव रंजन प्रसाद
www.rajeevnhpc.blogspot.com
उड़ने दीजिये समाधानों को आशीष भाई;
समाधान के स्थायी हो जाने से ऐसी सुन्दर कविताओं का सिरजन नहीं रूक जाएगा.
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
मै इकतीसवी कविता लिख रहा हूँ।
--क्या बात है!! बहुत खूब. लिखते रहिये.
do baar padhna pada samajhne ke liye...lekin kya adbhut kavita likhi hai aapne...badhai.
bahut badhiya likhate rahiye . dhanyawaad.
"चलता रहा ये सब बीस तक,
जोडता रहा मै सपने उन्तीस तक।
लगता है,अब ये गर्माहट खत्म हो जायेगी,
अहसासो पर बर्फ जम जायेगी।"
अदभुत पंक्तियाँ हैं, मन को छू गयीं।
आपके एहसास यूं ही जवाँ रहें और हम पाठकों तक कविता की शक्ल में पहुंचते रहें, यही कामना है।
"ढेर से खाली पृष्ठ...
अब मै फिर से उलझ चुका हूँ,
सवालो को पुनः फैला चुका हूँ,
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
मै इकतीसवी कविता लिख रहा हूँ।"
बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ हैं, सिर्फ इकतीसवीं ही नहीं इकतालिसवीं और इक्यावनवीं कविता का भी इंतजार रहेगा।
vah
Sir ji, ginti 31 se aage bhi to badhaaiye.
Nice poetry n nice feeling.
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