शनिवार, 17 मई 2008

मायाः भूख से संतुलन




मायाः भूख से संतुलन
तस्वीर जबलपुर के एक चौराहे का है। वैसे किसी भी गाँव ,कस्बे का हो सकता है। वो लडकी जो रस्सी पर चलती है,उसका नाम माया है। उसके पिता हाकम पास मे ही ढोल बजा रहे है,भाई तीरक फुँदने वाली टोपी पहने माया की मदद कर रहा है।
मै काम पर जाते समय उस चौराहे से गुजर रहा था। हाकम को अपना सरकस लगाते देखा,कुछ अपनापन लगा ,आखिर मै भी तो एसा ही कुछ करने निकला था। रुक गया। देखने लगा, उसकी और अपनी प्रक्रिया का अंतर।हाकम ने सबसे पहले चार बाँस के डंडे,दो दो के युग्म में एहतियात से आमने सामने लगा दिए,फिर रस्सी बाँध दी़।अपने ढोल की तरफ बढने से पहले उसने मजबूती परखी,आखिर बेटी का मामला है।जब तक तीरक भी चेहरे पर बंदर का मेकअप कर चुका था,उसने माया को एक लोहे का रिंग दिया,जिसे माया ने गले से एक कंधे पर फँसा लिया। ढोल बजने लगा....भीड जुटने लगी.......शुरु हुआ......माया का खेल.......भूख से संतुलन का खेल....। माया को हाकम ने गोद मे लेकर रस्सी पर खडा कर दिया,और फिर से ढोल बजाने लगा,तीरक ने जोर जोर से सिर हिलाना शुरु किया तो उसकी टोपी पर लगा फुँदना भी घुमने लगा। माया भी रस्सी पर चलने लगी.एक एक कदम संभल कर,लोगो ने ताली बजायी,तीरक को देखकर हँसने लगे। तीरक ने सिर घुमाते घुमाते माया को एक लोटा दिया,माया ने सिर पर रखा,तीरक ने दो लोटे और दिए,माया ने एक एक कर सिर पर जमा लिए।हाकम ने उढकर एक १० फिट लंबा बाँस माया को थमा दिया,माया ने उसे अपने छाति पर लटक रहे लोहे के रिंग में फँसाते हुए,दोनो हाथो से थाम लिया....लोग आश्चर्य से देख रहे थे और माया रस्सी पर संतुलन बनाते हुए चल रही थी..पुनः कलाकार को तालियाँ मिली...अब हाकम ने साईकिल का रिम रस्सी पर रखा,माया ने अपने तलवे से उस पर तुरंत कब्जा कर लिया। हाकम वापस ढोल बजाने लगा। दर्शको का कौतुक चरम पर था क्यौकि अब संतुलन कठिन हो चला था..सिर पर पहले ही लोटे एक के उपर एक करीने से जमे थे और हा्थ मे डंडा। ढोल बज रहा था...तीरक सिर घुमा रहा था...फुँदना घूम रहा था...माया ने रिम को तलवे में फँसा रस्सी पर चलना शुरु किया...तालियो की आवाजे आने लगी......माया ने भूख पर संतुलन पा लिया था,अब वो रस्सी पर चलने के बजाए नाच रही थी।दर्शक ताली बजा रहे थे।तीरक ने टोपी उतारकर उसमे पैसे जमा कर लिए।खेल खतम...पैसा हजम।
सब कुछ सामान्य था।माया ने भूख पर संतुलन पा लिया था,अतः हाकम बगल की होटल मे चाय पीने चल दिया और तीरक घर से लाया डब्बा खोल, दाल चावल खाने लगा।खेल का कारण हल हो रहा था।
"माया भूख है,
भूख आग है,
आग जलाती है,
आग सिर्फ जलाती है,
माया राख हो जाती है।"
पर भौतिकता के इस समय में भूख पर संतुलन नहीं रहा। कपडे,पैट्रोल,फोन बेचने पर भी भूख पर संतुलन नही आता तो लोग फ्रेश सब्जिया तक बेचने लगते है। इनकी माया राख नही होती.....भूख शांत नही होती....इनका संतुलन तो जमीन पर भी नहीं बन रहा....रस्सी पर क्या बनेंगा। माया तुमने वो संतुलित किया........... जिससे ब्रम्हाण हार रहा है, लाख कोशिश करने पर भी बढती जाती है. .........तुमने उसे संतुलित किया.........तुमने भूख को संतुलित किया.............तुम्हे प्रणाम! कोटि कोटि प्रणाम!
आशीष पाठक
जबलपुर।


6 टिप्‍पणियां:

समय चक्र ने कहा…

पेट की आग सभी संतुलन बना देती है बिगाड़ देती है फ़िर गरीबी एक अभिशाप है जो जीवित रहने और पेट की आग को शांत कराने के लिए हर काम को करने के लिए मजबूर विवश कर देती है . बढ़िया पोस्ट के लिए धन्यवाद

pallavi trivedi ने कहा…

एक बहुत गहरी और यथार्थ वादी सोच के साथ लिखा है आपने...बधाई इस अच्छी पोस्ट के लिए!

"ρσωєя σƒ тяυтн ιѕ ωιтнιη мє..!" ने कहा…

maya bhuk hai...
bhuk aag hai...
aag sirf jalati hai...
maya rakh ho jati hai...
wah...ati uttam...
sagar se bhi gehre shabdo ki uthal puthal ko sanjone ke lie badhai....

"ρσωєя σƒ тяυтн ιѕ ωιтнιη мє..!" ने कहा…

....

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

पेट की आग बहुत भयानक होती है, वह आदमी से कुछ भी करा लेती है।
बहरहाल, एक गम्भीर मुददा उठाने के लिए शुभकामनाएं।

Mugdha Singh ने कहा…

Kya khub likha hai aapne, aaye din aise tamashe sadkon pe dikh hi jate hain, aur yah sirf Jabalpur ki kahani hai, bade-se-bada shahar aur chhote-se-chhota gaon har kahin lakhon log pet ke liye jaddojahad karte hue aise hi jaan jokhim mein daalte hain. Wo bhi apne halat par majbur hain.